रविवार, 11 दिसंबर 2011

सुन ज़रा

                                             
  वह गली जो कभी अपनी हुआ करती | वह  घर जिसमें हम  अपना गुज़र बसर किया करते  थे | उन लोगो ने  छीन  लिया | हमारे बच्चों का बचपन  जो उन्हें नई ज़िन्दगी में  पनाह देती, क्या कुसूर हमारा क्या खता हुई हमसे,जो हमारा अपना ही बसा-बसेरा छीन लिया गया | और लाकर हमें उस दोराहे पर खड़ा कर दिया गया जहाँ जीने की कोई  उम्मीद ही नही |
कई  बरसों से गुजरात में रह रहे ये लोग, शायद इन लोगो ने अपना कल  नही  देखा था | तिनके -तिनके के लिए मजबूरियां तो आ ही जाती है | लेकिन सर छुपाने के लिए छत का सहारा ही नहीं रहेगा ये तो कभी सोचा न था |
आज इनकी जिंदगी एक मोड़ पे आकर खड़ी हो गई  | इनका अपने आपका हक भी छीन लिया गया | बच्चे भी भूखे नंगे रह जाते है | वह  लोग रो -रो कर यही कहते  है कि  हमें  ऐसी जगह छोड़ दिया जहाँ न जवान लड़कियां सुरचित  रह पाएगीं | और न बच्चे खेल पाएंगे |  दूर - दूर तक जंगल-झाड़ियाँ है | जिससे की सांप -बिच्छु का खतरा है | इन सब का डर सताता है | चैन  की नींद भी नही सो सकते | वह  सारी रात तम्बू में ही बैठे- बैठे गुज़ार देते है | उन लोगो के पास जाकर खड़े होना | वह हम सब से चीख - चीख कर यही कह रहे थे | हमारा घर उजाड़ दिया घर का सारा सामान भी दब गया | भीख मांग कर भी हमारा गुज़ारा नहीं होता | वक़्त गुजरा नही | कि भीख मांगने के लिए मजबूर हो गए , मेहनत करके दो वक़्त का भी नही कमा पाते है  | मांग कर भी घर का गुज़ारा नही होता मरने के लिए छोड़ दिया | क्या हम इंसान नही है |
वह सब अपना -अपना दुःख बताने के लिए उतावले हो रहे थे , वह अपनी ही दास्ताँ बताते -बताते रो पड़ते थे | मानो उन लोगो कि ज़िन्दगी जीने का आसरा ही खत्म कर दिया |