गुरुवार, 10 जनवरी 2013

उडी पतंग


                                                               उडी पतंग 
  लो जी ....

  आ-गई पतंगों की बहार , ये डोर  पनप रही । इन छोटे - छोटे हाथों मै  थम रही है । ये पतंग हवा मै  मचल रही है , दिलों मै  उमंगें  उभर रही है , इधर-उधर  नज़रे तलाशती फिर  रही है ।
 कि  कब ... कटेगी ये पतंग ...
                     कब मिलेगी ये पतंग ...
 ज़रा  इन्हें भी अपने रंग मै  रंग लेने दो ।कहीं ख़ामोशी बिछी हुई है । लेकिन फिर भी ज़ज्बा वही है ।सबकी  पतंगों का रंग अलग अलग है , जब मेरी पतंग उडी ।तो  सब पतंगों मै  घुल मिल गई  ।
रंगों की रंगत मै रंगी ये पतंगे ,सभी को खुश रखती है ।चरखे पर  लिपटती डोर और रंग बिरंगी पतंगें इसका तो जवाब ही नहीं , इन पतंगों का खेल भी अजीब होता है । कुछ हवा मै उड़ाते है तो कुछ देख कर  मज़ा लेते है ये पतंगें आम लोगो की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गई है ।
मै  हमेशा की तरह आज भी उड़ रही हूँ ।मै  खुश हूँ, आज़ाद हूँ, किसी के बंधन मै  कैद नहीं , और आज भी मै सबके  दिलों मै जिंदा हूँ ।मेरी दोस्ती सभी से है ।लेकिन खास कर बच्चे मुझे ज्यादा पसंद करते है।