रविवार, 12 मई 2013

ज़िन्दगी ctrl + z तो नहीं हैं ..फिर भी


पीली- नीली लाइट में  चमकती उसकी वो  उँगलियाँ ...और लैंप लाइट के सामने बैठ कर मुस्कुराते गुनगुनाते डायरी  लिखता  है , अब बड़ा हो कर  सब कुछ समझ मे आ ही गया  ..उसके पास ढेरों पुस्तके पड़ी है जिनमें बहुत  पहले की यादें समेटे हुई है ..किसी मैं  सूखी गुलाब की पंखुड़ी, तो किसी में  टहनी,  किसी में  कार्टून, तो कहीं सबक लिखा है ...उसमे सबसे इम्पोर्टेंट टीचर की साइन, दरसल तब तो वो बच्चा  था  , बड़ा होने के बाद ये सब देख कर दिल मुस्कुराता तो है ही  :)  ... घड़ी की सुई टिक -टिक चाँद तारे टिम- टिम ....थोड़ी देर बाद पैगाम आता है हवाओं का , चिराग़  बुझ गया ।  अँधेरा छा गया , पीछे से नानी अम्मा  की आवाज़ आती है ..बेटा सो जाओ ..मैंने  एक न सुनी नानी अम्मा  के कहने के बाद मै कबीर दास का दोहा गुनगुनाने लगता हूँ  अपनी धुन में,,,,,,,
काल  करे  सो  आज कर, आज करे सो अब .....
पल में परले होइगी बहुरि करेगा कब  ............
फिर नानी अम्मा की छड़ी  की आहट  आती है । पास आकर बोलती है कि तुम्हे  सोना नही है  ।  क्या कर रहे  हो  .. मेरे हाथ की डायरी जल्दी से बंद हो जाती है ..वैसे  भी माँ से कुछ छिपा नही है ।  तो नानी अम्मा से क्या छिपे गा  ..फिर भी नानी अम्मा की  समझ में सब कुछ आता है .. जबकि मैंने  सिर्फ़  अपनी डायरी मै यही लिखा था । "एक खूबसूरत दिन" मै चाहता था ।  कि  ये यादें समेट  कर एक लॉकर  में बंद कर दू ।  एक बेपहिये की गाडी की तरह जिसमे हमने बहुत  कुछ सीखा  गली गलियारों में टहले स्कूल जाते बारिश में भीगना कभी दोस्तों के साथ  बायस्किल प्रतियोगिता , और  बहुत सी बातें । कि तुम उसे याद  न करो सबको समेट कर रख दो  ज़िन्दगी ctrl + z तो  नहीं हैं कि उसे दबाने के बाद सब कुछ वही का वही हो जाए  । सोने से पहले एक सुनहरी सुबह का इंतज़ार होता है , और सुबह उठते ही मैं खिडकियों के पास जरूर जाता था , हर किसान सुबह सुबह गाये  भेंशो को चारा दे कर अपने खेत निकल जाता था, चिड़ियाँ दाना लेकर आ जाती थी , दादा जी नमाज पढ़ कर हुक्का भी  गुद्गुड़ाने लगते थे ..उधर पंडित जी अपनी लुटिया लेकर उगते सूरज को नमन कर रहे होते है ...हम्म  मैंने बहुत कुछ देख लिया , तबतक अखबार वाला आ गया चलो ......दुनिया की खबरें देखते हैं ...क्या फ़रमाते है जनाब ... खबरों से दिल भर जाता है , क्या हो रहा है क्यूँ हो रहा है , इन नेताओ के बीच जनता क्यूँ पिस रही है , फसबूकिया लोग तो फेसबुक पर युद्ध  लड़ रहे है , तमाम बातें है  तबतक चाये  आ जाती हैं  ( मुस्कुराते हुए ) हम भारतीय चाये  की चुश्की  के बगैर  रह भी नहीं पाते ।