सुना हैं,आजकल उन घरों कि खिड़किया बन्द रहती हैं।
जिस घर के पास वाली गली से हम अक्सर गुज़रा करते थे।
घर में बहारों का आना बन्द हो गया, वरना थोड़े बहुत पतझड़ सलाम करने जाते थे
देखे हैं, रोशनदान घरों में, जहां से आती हैं, चाँदनी रात की रौशनी छन - छन कर
जब मैं बरामदे में आता हूँ , ऐसा लगता कोई मेरा इन्तिज़ार कर रहा हैं
सिर उठा कर देखता हूँ। तो रात की चांदनी मुस्कुरा रही थी।
तो मैं भी मुस्कुराया शायराना अंदाज में,
लेकिन मैं शराब के नशे में, फ़िर भी चूर - चूर था
इस चाँद के मुखड़े को नही देखता अगर, तो ज़ुबान पे शायरी यूँ ही न आती,
और न ही मेरी डायरी में कैद होती, इनकी बातैं
ज़िन्दगी से थका हारा शराब की लत में मस्त हो जाता
तुम हमेशा खामोश रहती हो। उस काली अन्धेरी रात में,
हवाएं आती हैं बस छू कर चली जाती हैं। कभी उन्हें बैठने कि फुर्शत कहाँ
दूर से देखता हूँ तो एक टुकडा सा लगता हैं, ये चाँद
लेकिन ये चाँद और चाँद की रौशनी मेरे लिये बहुत एहमियत रखती हैं।
वरना ये तन्हाई कहाँ पीछा छोड़ती !!
जिस घर के पास वाली गली से हम अक्सर गुज़रा करते थे।
घर में बहारों का आना बन्द हो गया, वरना थोड़े बहुत पतझड़ सलाम करने जाते थे
देखे हैं, रोशनदान घरों में, जहां से आती हैं, चाँदनी रात की रौशनी छन - छन कर
जब मैं बरामदे में आता हूँ , ऐसा लगता कोई मेरा इन्तिज़ार कर रहा हैं
सिर उठा कर देखता हूँ। तो रात की चांदनी मुस्कुरा रही थी।
तो मैं भी मुस्कुराया शायराना अंदाज में,
लेकिन मैं शराब के नशे में, फ़िर भी चूर - चूर था
इस चाँद के मुखड़े को नही देखता अगर, तो ज़ुबान पे शायरी यूँ ही न आती,
और न ही मेरी डायरी में कैद होती, इनकी बातैं
ज़िन्दगी से थका हारा शराब की लत में मस्त हो जाता
तुम हमेशा खामोश रहती हो। उस काली अन्धेरी रात में,
हवाएं आती हैं बस छू कर चली जाती हैं। कभी उन्हें बैठने कि फुर्शत कहाँ
दूर से देखता हूँ तो एक टुकडा सा लगता हैं, ये चाँद
लेकिन ये चाँद और चाँद की रौशनी मेरे लिये बहुत एहमियत रखती हैं।
वरना ये तन्हाई कहाँ पीछा छोड़ती !!