शनिवार, 13 जून 2015

बारिश में घर याद घर आ रहा है

बारिश में घर याद  घर आ रहा  है 
कच्चे आमों  का आचार याद आ  रहा है 
पके  आमों ख़ुश्बू याद आ रही है 
भुट्टा भुनने   की आवाज़ आ रही है 
खिड़की से  आने  वाली  बारिश  की  बौछार  याद आ रही है
बारिश के  दिनों  का सन्नाटा  याद  आ  रहा है 
सन्नाटे में लोगो का  गुनगुनाना याद आ रहा है 
दो  बजे  की अज़ान  याद आ रही है 
कव्वों  की  आवाज़  याद आ रही है 
बया  का घोंसला  याद आ रहा है
ज़ख़्मी ( तोता ) पट्टू लाला  याद आ रहा है
छत से टपकता  पानी  याद आ रहा है
हवाओं की सुर  याद आ रही है 
पत्तों का सिमट जाना  याद आ रहा है
गेंहूँ की खनकती  बालिया  याद आ रही है 
नीलगाय  का  डर  कर भागना  याद आ रहा है
बारिश में  आँख बंद कर के सायकिल चलाना 
और  फिर  किसी खाई में गिर जाना  याद आ रहा है
नदी में पत्थर फेंकना  याद आ रहा है
और अम्मी के  हाथों से बनाये  शामी कबाब  और गलौटी  कबाब याद आ रहें  है 



गुरुवार, 26 मार्च 2015

हुनर का झरोखा

दिन ख़ामोश था पुराने गाने बज रहे थे धीमे धीमे, सामने वाले कमरे में बैठकर मस्जिद की मीनार को देखा करती थी, जब जब ज़ोहर की आज़ान होती मीनार में सोये हुए परिंदे उड़ते थे, नानी रोज़ कहा करती थी,तुम खाली बैठी हो, और इन परिंदों को देखने के लिए  कुछ सीख लो मेरे साथ बैठ कर  कुछ काम नही होता मेरे पास और ख़ाली समय कटता नही, मैं तुम टुप्पटे में फ़र्दी डालना बता दू कैसे डालते है, फिर में सट्टी बाज़ार से फ़र्दी वाला तार मंगवाया और मैंने डालना सीख लिया