गुरुवार, 26 मार्च 2015

हुनर का झरोखा

दिन ख़ामोश था पुराने गाने बज रहे थे धीमे धीमे, सामने वाले कमरे में बैठकर मस्जिद की मीनार को देखा करती थी, जब जब ज़ोहर की आज़ान होती मीनार में सोये हुए परिंदे उड़ते थे, नानी रोज़ कहा करती थी,तुम खाली बैठी हो, और इन परिंदों को देखने के लिए  कुछ सीख लो मेरे साथ बैठ कर  कुछ काम नही होता मेरे पास और ख़ाली समय कटता नही, मैं तुम टुप्पटे में फ़र्दी डालना बता दू कैसे डालते है, फिर में सट्टी बाज़ार से फ़र्दी वाला तार मंगवाया और मैंने डालना सीख लिया