सोमवार, 10 सितंबर 2018

जुलाहा की मुठिया

भारत का हथकरघा उधोग मर रहा है। २०१४ में पॉवर में आई सरकार अभी भी बुनकरको के लिए कुछ  बेहतर नहीं सोच पाई, एक ऐसी कला, एक ऐसा तबका जो किसी अँधेरे में ख़ामोशी से ख़त्म होने की कगार पर है। 
 एक ज़माना हुआ करता था जब हिंदुस्तान में  हथकरघा काम का बोलबाला था खादी के कपड़ों से ले कर रुमाल तक बनाये जाते थे हिंदुस्तान के हर गलियों गांवों में बुनकरी की शटर-पटर घर-घर में गूंजती थी  आराम से गुजर बसर करने वाले ये बुनकर किसी की पहचान के मोहताज़ नहीं थे। 
हिंदुस्तान में बहुत से बुनकर है जिनका काम अलग अलग होता है जैसे  गमछा कुर्ता कालीन बनारसी साड़ियां और भी कई तरह की अलग अलग राज्य में साड़ियां बुनी जाती है ऐसे ही दिल्ली में दूर दराज़ से पलायन कर के दिल्ली शहर के बुनकर कॉलोनी में रह कर काम कर रहे हैं कोई बचत ना होने के बावजूद भी वह इस काम में लगे रहते है।  ताकि वह इसके साथ साथ अपने सपनो को बुन सके बहुत मुश्किल से अपने दवा पानी तक का खर्च निकाल पाते है 
और ज्यादा तर साठ सत्तर  साल तक के लोग इस काम को कर पा रहें है 
 हालात  भयावह है एक ऐसी कला जो आधुनिकों के हाथों मर रही है  एक ऐसा तबका जो हुनर मंद तो है लेकिन अपने ही काम से वंचित है सरकारी घोषणाओं से वंचित है, अशिक्षित  होना और बेरोजगार होना सबसे बड़ा सवाल है दम तोड़ती इस बुनकरी के काम को इनके अपने ही बच्चे इस पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने  से मना कर रहे है,  ये हथकरघा की मुठिया बुज़ुर्गों तक ही जीवित है जो लोग अभी इस काम को कर रहें हैं। 
ठोस लकड़ियों से बानी ये हाथ करघा मकड़ी के जालों में छिप गई है धुल बिछ गई है खिड़की से चमकती शाम भी ढल गई है 

अरमा नफीसा अंसारी