शनिवार, 9 नवंबर 2019

अम्मी

उम्मीदें अक्सर बढ़ावा देती है, जाना कहाँ है पता नहीं न मैंने हार मानी न उम्मीदें छोड़ी, लेकिन जैसे अम्मी के साथ सपने सजाये, घर का ख़्वाब देखा। लेकिन ज़िन्दगी अचानक से ख़फ़ा हो गई, सोचा नहीं था अम्मी का साथ  आधे रास्ते तक का सफ़र होगा, दिल्ली आये ९ साल हो गए।   
 घर जिनकी उम्मीदों पर खड़ा था वह उम्मीद नहीं थी वह घर खाली था, अम्मी के जाने पता ही नहीं चला  अचानक इतने सारे लोग कहाँ चले गए वह ईद से पहले वाली तैयारियां वह ईदगाह वाली परफ्यूम ईद की मीठी सेवईयां ईद की चूड़ियां ईद के कपडे  सब कुछ एकदम से किसी संदूक में सिमट कर रह गया, 
आपके आने की राह देखती रहती हूँ आपके हाथ की कोमलता ढूंढती हूँ आपके साथ फिर से गपशप करना चाहती हूँ कल आप मेरे आने का इंतज़ार कर रही थीं आज मैं आपका, पता है आप कभी नहीं आएंगी ये दिल खाली खाली बड़ी सारी चीज़ें टटोलता है     


-अरमा नफीसा अंसारी  

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019

दीवारें कुछ कहना चाहती है

मेरे घर की दीवारें सुकबुका रही है कुछ कहना चाहती है, इन दीवारों पर अलग अलग चित्र बने दिखाई देते है कभी कुत्ता कभी बिल्ली कभी इंसान बिल्कुल उसी तरह जब चाँद पर आंखें गड़ाये देखते रहो ऐसा मालूम होता है, कोई लालटेन लिए अपने सपनों का  ढूंढने निकल रहा हो
अलग अलग किरदार मालूम होते है , इन दीवारों पर दरारें पड़ रही है, जैसे कोई झीलों की क़तार हो समंदर सी गहराई मालूम होती है, दीवार से पुता  हुआ चुना गिर रहा है,  दीवारों के सटीक खुदाई चल रही है वह खुदाई कोई और नहीं बल्कि चीटियां कर रहीं हैं , दीवारों से गिरा चुना चीटियों की मिट्टी में जा मिला है. चीटियां बेतहाशा हो कर अपना घर छोड़ रही है. फिर कोई कीड़े मकोड़े अपना आशियाना न बना लें