रविवार, 19 फ़रवरी 2012

गोधरा कांड

    अरमा अंसारी 

      
   समाज  में  कुछ लोगो ने  इंसानियत को नही पहचाना ।  इंसान ने इंसान के दर्द को नही 

जाना । २७ फ़रवरी  सन 2002 को गोधरा  मे ट्रेन जलाई गई । उसके दुसरे दिन कुछ लोगो ने मुसलमानों पर हमला  बोल दिया । हमला  करने वालो ने ये नही सोचा कि भला ये मासूम  किसी का क्या बिगाड़ेगे 

जिन मासूमों को इन लोगो ने जिन्दा  आग के हवाले किया । उनको को तो दुनियां में आये हुए एक साल 

एक महिना या एक दिन ही हुआ होगा । सन २००२ के गोधरा कांड  से आज भी लोग उस हादसे से बाहर 

नही  निकल पांए है । तमाम अपनों से बिछड़  कर घर  से बेघर  हुए । किसी को जिन्दा जलाया तो किसी को 

तलवार कि धार का निशाना बनाया ।  

बड़ी मुद्दत मे ये गलियां मुस्कुरायीं है !
हाँ ये सच है । कि  वो सूनी गलियां जो दहशत 
से भरी थी । और दहशत  मे थे लोग  । ये मै नही ये वो लोग  कह रहे है । जिन लोगो ने अपनों को लुटते  हुए देखा है ।अपनी ही आँखों से अपने कलेजे को तड़फते  हुए देखा है | लेकिन दस साल के बाद भी वो  अपनों को भुला नही पाए । और शायद भूल भी नही पायेंगें । क्यूंकि आज १० साल के बाद भी  वो दुःख भरी दास्ताँ अपनी - अपनी जुबान से बयां नही कर पातें । जब हमने एक औरत से इस हवाले के बारे मै जानना  चाहा। तो वो सब बताने से पहले उसकी पलके भीग गई । क्यूंकि वो वाक्या  उसकी नज़रों के सामने  तुरंत  आ गया । उसकी १५ साल कि बच्ची का रेप कर  उस माँ के  सामने मार डाला गया   । वह माँ  चीख कर रह गई । लेकिन कुछ नहीं कर पाई । ऐसे कई परिवार थे ऐसी कई माँ थी । जिन्होंने अपनी औलाद को जिन्दा  ही  जलते कटते मरते देखा है  । न जाने क्यूँ जिंदगी का सफ़र ऐसा क्यूँ जरुरी होता है । उनका खुलकर बाहर आना - माहिया कहती है । कि अब  डर किस बात का  डरते -डरते अपनों को खो चुकी हूँ ? अब तो मेरा कोई नही है । और हर  चीज़ का सामना मै खुद करती हूँ ?  सारी बहनों कि मदद करती हूँ और आगे करती रहूँ गी