अरमा अंसारी
जाना । २७ फ़रवरी सन 2002 को गोधरा मे ट्रेन जलाई गई । उसके दुसरे दिन कुछ लोगो ने मुसलमानों पर हमला बोल दिया । हमला करने वालो ने ये नही सोचा कि भला ये मासूम किसी का क्या बिगाड़ेगे
जिन मासूमों को इन लोगो ने जिन्दा आग के हवाले किया । उनको को तो दुनियां में आये हुए एक साल
एक महिना या एक दिन ही हुआ होगा । सन २००२ के गोधरा कांड से आज भी लोग उस हादसे से बाहर
नही निकल पांए है । तमाम अपनों से बिछड़ कर घर से बेघर हुए । किसी को जिन्दा जलाया तो किसी को
तलवार कि धार का निशाना बनाया ।
बड़ी मुद्दत मे ये गलियां मुस्कुरायीं है !
हाँ ये सच है । कि वो सूनी गलियां जो दहशत
से भरी थी । और दहशत मे थे लोग । ये मै नही ये वो लोग कह रहे है । जिन लोगो ने अपनों को लुटते हुए देखा है ।अपनी ही आँखों से अपने कलेजे को तड़फते हुए देखा है | लेकिन दस साल के बाद भी वो अपनों को भुला नही पाए । और शायद भूल भी नही पायेंगें । क्यूंकि आज १० साल के बाद भी वो दुःख भरी दास्ताँ अपनी - अपनी जुबान से बयां नही कर पातें । जब हमने एक औरत से इस हवाले के बारे मै जानना चाहा। तो वो सब बताने से पहले उसकी पलके भीग गई । क्यूंकि वो वाक्या उसकी नज़रों के सामने तुरंत आ गया । उसकी १५ साल कि बच्ची का रेप कर उस माँ के सामने मार डाला गया । वह माँ चीख कर रह गई । लेकिन कुछ नहीं कर पाई । ऐसे कई परिवार थे ऐसी कई माँ थी । जिन्होंने अपनी औलाद को जिन्दा ही जलते कटते मरते देखा है । न जाने क्यूँ जिंदगी का सफ़र ऐसा क्यूँ जरुरी होता है । उनका खुलकर बाहर आना - माहिया कहती है । कि अब डर किस बात का डरते -डरते अपनों को खो चुकी हूँ ? अब तो मेरा कोई नही है । और हर चीज़ का सामना मै खुद करती हूँ ? सारी बहनों कि मदद करती हूँ और आगे करती रहूँ गी
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