शनिवार, 20 अप्रैल 2013
वो शाम
चली जा रही है वो अपनी धुनों मे बसों की कतारें ।
जल रही थी वो बत्तियाँ वो बिजलियाँ
चलो घर की अब वो घडी याद आई ।
चलो घर की वो शाम फ़िर लौट आई ।
चलो घर की वो शाम फ़िर लौट आई ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें