बरसात की भीनी - भीनी सी खुशबू गरजते - बरसते बादल के तले जब होती थी,किलकारिओं कि गूंज, अब आ गए बिन बुलाये मेहमान,शोर मचाते आँख दिखाते,घनघोर घटा सी छा जाती । फिर हमारे आँगन में आते | हमारे अच्छे दोस्त बन जाते । खूब नहाते, बातें करते, संग - संग जाने कितनी मस्ती करते | कितने सपनो को बटोरते,अचानक से जाने कब चली गई ये बारिश, छोड़ गई कुछ हल्की- हल्की बुँदे ! टपकती थी, पूस से रंग बिरंगी बूँदें , और बचे थे मेरे आांगन में बस मेरे छोटे छोटे पाँव के निशान , हाँ कुछ तो बाकी थी बूंदें ,कुछ ख़ामोशी सी छा गई । मुझे कुछ कहना था , करनी थी, कुछ बातें |