सोमवार, 9 दिसंबर 2013

भीनी सी खुशबू

बरसात की भीनी - भीनी सी खुशबू  गरजते - बरसते बादल के तले जब होती थी,किलकारिओं कि गूंज, अब आ गए बिन बुलाये मेहमान,शोर मचाते आँख दिखाते,घनघोर घटा सी छा जाती । फिर  हमारे आँगन में आते | हमारे अच्छे  दोस्त बन जाते । खूब नहाते, बातें करते, संग - संग  जाने कितनी मस्ती करते | कितने सपनो को बटोरते,अचानक से  जाने कब चली गई ये बारिश, छोड़ गई कुछ हल्की- हल्की बुँदे ! टपकती थी, पूस से रंग बिरंगी बूँदें , और बचे थे  मेरे आांगन में बस मेरे  छोटे छोटे  पाँव के  निशान , हाँ कुछ तो बाकी थी बूंदें ,कुछ ख़ामोशी सी छा गई ।  मुझे कुछ कहना था , करनी थी, कुछ  बातें |  

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