दिल्ली के उर्दू बाज़ार में हर
रोज़ ऐसी चहल पहल के साथ दिल्ली की इमारतें भी लोगो के साथ मसरूफ रहतें हैं इन्ही चहलपहल
के बीच नज़र आ रहे है ग़ालिब साहब उत्तर
प्रदेश के रहने वाले ग़ालिब साहब काम के सिलसिले में दिल्ली आ कर बस गए दिल्ली
के अलग अलग नुक्कड़ पर अपने काम का सिलसिला शुरू किया और
पुरानी दिल्ली की गलियों में इनकी क़लम और कला दोनों को देखा
जाने लगा अपनी कला
को क़लम के ज़रिये कोरे कागज़ों पर किताबत करते और रोटी-रोज़ी का ज़रिया
बनाया लोग इनसे तरह -तरह के पैग़ाम छपवाते हैं कोई सालगिरह पर
तो शादी के कार्ड तो कोई शेर लिखवाते हैं कोई
ज़माना था जब खतीबों की मांग हुआ करती थी नौकरी की कमी नहीं थी खतीबों
को उर्दू की किताबें लिखने के लिए काम दिया जाता था और ये कई
अलग-अलग रूपों में किताबत का गवाह रहा है लेकिन अब इसका इतना
दौर नहीं रहा
कंप्यूटर
तकनीकी ने इतनी तेज दौड़ लगाई की इनके रोज़गार और कला पर ज़बरदस्त असर पड़ा, जिससे
की नौकरी की कमी का कारण बना हिंदुस्तान
में क़िताबत करने वाले शायद ही कुछ हो फिलहाल अभी ये दिल्ली में किताबत
करने वाले इकलौते वारिस है इनके पास जो ये लकड़ी की क़लम बुनियाद हैं और
विरासत भी है जिसका इतिहस धुंधला सा होता जा रहा है एक ऐसी कला जो लोगो
के दिल और दीवारों पर ज़िंदा है वह दिन दूर नहीं जब हम भारत में क़िताबत के
बारे में दुखद कहानियां साझा करंगे
अरमा नफीसा अंसारी
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