बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

ग़ालिब साहब की क़िताबत

दिल्ली के उर्दू बाज़ार में हर रोज़ ऐसी चहल पहल के साथ दिल्ली की इमारतें भी लोगो के साथ मसरूफ रहतें हैं इन्ही चहलपहल के बीच नज़र आ रहे है ग़ालिब साहब उत्तर प्रदेश के रहने वाले ग़ालिब साहब काम के सिलसिले में दिल्ली आ कर बस गए दिल्ली के अलग अलग नुक्कड़ पर अपने काम का सिलसिला शुरू किया और पुरानी दिल्ली की गलियों में  इनकी क़लम और कला दोनों को देखा जाने लगा अपनी कला को क़लम के ज़रिये कोरे कागज़ों पर किताबत करते और रोटी-रोज़ी का ज़रिया बनाया लोग इनसे तरह -तरह के पैग़ाम छपवाते हैं कोई सालगिरह पर तो शादी के कार्ड तो कोई शेर लिखवाते हैं  कोई ज़माना था जब खतीबों की मांग हुआ करती थी नौकरी की कमी नहीं थी खतीबों को उर्दू की किताबें लिखने के लिए काम दिया जाता था और ये कई अलग-अलग रूपों में किताबत का गवाह रहा है लेकिन अब इसका इतना दौर नहीं रहा 
इनका मानना सरकारी दफ्तरों में इतनी अहमियत नहीं रही  मुग़लों के ज़माने में बड़ी-बड़ी इमारतों पर किताबत की शानदार पहचान बनाई गई  जो पहचान अब भी है लेकिन कागज़ों पर जो ये काले रंग की दवात है जिसमे कोई रौशनी नज़र नहीं आती 
 कंप्यूटर तकनीकी ने इतनी तेज दौड़ लगाई की इनके रोज़गार और कला पर ज़बरदस्त असर पड़ा, जिससे की नौकरी की कमी का कारण बना हिंदुस्तान में क़िताबत करने वाले शायद ही कुछ हो फिलहाल अभी ये दिल्ली में किताबत करने वाले इकलौते वारिस है इनके पास जो ये लकड़ी की क़लम बुनियाद हैं और विरासत भी है जिसका इतिहस धुंधला सा होता जा रहा है एक ऐसी कला जो लोगो के दिल और दीवारों पर ज़िंदा है वह दिन दूर नहीं जब हम भारत में क़िताबत के बारे में दुखद कहानियां साझा करंगे

अरमा नफीसा अंसारी 
 

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