वह घर कच्ची मिटटी से बना हुआ और घर की दीवारें रंगीन चुने से पुता हुआ ईद की ख़ुशी में और रंगीन चमकता हुआ घर, इस घर में डाकिए महीने भर में ख़त लाते रहते लेकिन हर दफ़ा गली के गलियारे भूल जाते हैं,जो भी डाकिया आता है गांव के उस नुक्कड़ पर पर रखीं पान वाली गुमटी के पास सायकिल रोक कर पता पूछता है, डाकिया गांव के अंदर जाता हुआ घर का पता ढूंढता हुआ बड़बड़ता हुआ, सायकिल टूटी फूटी सड़को पर खडबड़ करती हुई मचलती हुई रास्ता पूछती हुई सबका ध्यान अपने खतों की तरफ खींचती हुई उस रंगीन दीवारों वाले घर तक पहुंचना चाहती थी गावों के लोग भी इसी नाम से जानते थे रंगीन आसमानी कलर का घर जो चुने से पता हुआ है किस तरह के दरवाज़े होंगे खिड़किया कैसे होंगी घर के सामने पेड़ लगा होगा सब यही पता बता रहे थे, एकदम सीधा चले जाईये जनाब दांयें बाएं मत मुड़ियेगा नहीं तो भटक जाएंगे
डाकियाँ पसीना पोछता हुआ फिर से सायकिल के हैंडल पर रखा हाथ, और हाथ में ख़त, ख़त में पता जिसका कोई नहीं अता - पता
- अरमा नफीसा अंसारी
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