मुझे कुछ याद नहीं ...
समझ नहीं आ रहा क्या लिखा जाए, बड़े दिन बाद जो बैठी हूँ लिखने कुछ याद तो नहीं
सोचती हूँ क्या करू किसके बारे में लिखू थोड़ा सा इश्क थोड़ी सी ख़ामोशी थोड़ी सी शरारत
फरमान है कि- की उलझनों ने लफ़्ज़ों को कैद कर लिया है ! ऐसे जैसे उनके आने की रुकावट हो
मैं परेशान हूँ... क्या हुआ मुझे, मुझे कुछ याद क्यों नहीं आ रहा! खूबसूरत लफ़्ज़ों को पिरोऊँ कैसे
अपने इस नए साल के हवाले कैसे करूँ
मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा...
सब बंद खिड़की और दरवाज़ों की तरह कैद हो गए
जैसे कभी कुछ लिखा ही नहीं
मेरे हिस्से के लफ्ज़ कहाँ चले गए
वह मेरे हिस्से की रौशनी थी
चमचमाती रात के सितारे थे मेरे लफ्ज़
भला मुझे कुछ याद क्यों नहीं
और मुझे ये याद क्यों नहीं आ रहें है
शायद उलझनों की कड़वाहट मेरे लफ़्ज़ों को दूर कर गई
मुझे सुकून देने का रास्ता मेरी लिखावट थी
मेरी परेशानी में वह हमदम साथ थे
और मैं लफ़्ज़ों को गुनगुनाती थी
मुझे कुछ याद नहीं ....
या रब माफ़ करना मुझे
में थोड़ी ज़िद्दी और कभी कभी नाराज़गी जताई
लेकिन लफ़्ज़ों को हमेशा अपने दिल में रखा
अब क्या हुआ शायद मैंने ख़ामोशी से रहना बंद कर दिया
अरसे से उनसे नए ज़माने की बात नहीं की
मेरे हिस्से के लफ्ज़ मेरी दुनिया है
इनको हमेशा डायरी के हवाले किया
मेरी क़लम ने इन लफ़्ज़ों से ही मैंने इश्क़ किया
इनके बिना मेरा दिन नहीं गुज़रता
शाम मानो अधूरी है तुम्हारे बिना
मेरे लफ़्ज़ों के बिना...
फिर से, ज़हन और दिमाग में उतारूंगी
फिर वही बारिश वाली शाम का हवाला लिखूं गी
मंदिर में मिली पंजीरी प्रसाद से स्कूल का २६ जनवरी का ड्रामा लिखूंगी
दोपहर वाली ज़ोहर की अज़ान लिखूं गी
और लिखूंगी बचपन के क़िस्से कहानियां
फिर से उन लफ़्ज़ों को क़लम के हवाले उतारूंगी
फिर क़लम और अल्फ़ाज़ों से होगा इश्क़
और मेरी डायरी संभाले गी इनके दस्तूरों को
इनकी खुशबू महकेगी बाग़ों में, समंदर की लहरों की तरह मचलेगी जब क़लम
कभी हिरणी की तरह कभी तितली की तरह
डायरी पर जादुई अल्फ़ाज़ों से बिखेरेंगी अपना याराना
बस मेरे हिस्से के लफ्ज़ वापिस आ जाए
अरमा नफीसा अंसारी
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