शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

किचन की गिलहरी

 मेरे किचन की गिलहरी जब भी सुबह दबे पाँव आती है तो वह सबसे पहले रोटियों के टुकड़े तोड़ कर अपने साथ लेकर जाती फिर आती दो गिलहरियाँ जब देखा में नहीं है कोई खूब उछल कूद मचाती मेरे किचन के डब्बे पर चढ़ उत्तर कर चीज़ों खूब तलाशते 

शनिवार, 6 अप्रैल 2024

दरग़ाह के जिन्नात _Arma Ansari

कोयल बेबाक़ है अपनी आवाज़ से सबको ये बता रही कि आमों की बोर आ गई, धूप में चटक है पसीने में मिठास आना लाज़मी है, गुनगुनी धूप से टेशू की कच्ची कलियाँ फूट रही है, इम्तिहान हो रहे है,  इसलिए  इक्का दुक्का बच्चे मस्ती करने आ जाते है जब तक स्कूल का गेट खुला है कुछ बच्चे जा रहे है बीच की दोपहर को अपने बस्ते को सर पर रखे घर का फासला स्कूल से काफी दूर है  तो ज़्यादातर बच्चे कहीं न कहीं ठहर जाते  कभी आम के पेड़ों  की छाँव के तले, तो कभी कुंए के पास, और पास के खुले मैदान में चारों तरफ ग्राउंड बना था जिसके अंदर पानी पीने का नल लगा था, वह था ईदगाह , ईदगाह का गेट छोटा था तो बच्चे तपती धूप  में अंदर भी चले जाते दीवारों से सटा हुआ मेहराब दार छोटा सा बरमदाह था जहाँ इमाम साहब ईद के दिन उसी बरामदे में नमाज़ पढ़ाते थे और बाकी नमाज़ी खुले मैदान में नमाज़ अदा करते और फिर लोग तभी आते जब उन्हें क़ब्रगाह पर अपनों से मिलने आते तो वहीं से ईदगाह पर फ़ातिहा पढ़ने आ जाया करते ईदगाह पर दोपहर की कड़कती धूप और सन्नाटे को चीरते हुए बच्चों की दूर से आ रही आवाज़ें अच्छी लग रही थी. ये आज का ज़माना है लेकिन जिन्नातों की कहानियाँ किसी पुराने दौर की जब वह यहाँ वाक़ई में उनके होने के बारे में बतलाया जाता था मैंने उनके बारे में सुना था. ये भी सुना था वह ख़ूबसूरती पर मर मिटते है. किसी के बालों पर किसी की अदाओं पर तो किसी की आँखों पर किसी न किसी की हरक़तों पर वह फ़िदा हो जाते 


उनका रहन सहन साफ़ और सुकून जगहों पर रहता है, इसमें से पहली जगह तो ईदगाह दरग़ाह, खंडहर, पुराने खाली मकान या किसी मकान का खाली बरामदा लेकिन जिन्नात कभी दिखाई नहीं देते। जिन्नातों की बातें बड़ी दिलचस्प है खुश हुए तो बरक़त नाराज़ हुए तो काफी नुकसान भी करते है क्यूँकि घरों की चीज़ों में हलचल होना उनकी अलग तरह की ख़ुशबू है 


सबसे पहले ख़ुदा  ने नूर से  फरिश्तों को बनाया।  फिर बिना धुएं की आग से जिन्न को बनाया और फिर इंसानों को मिट्टी से बनाया।जिन्न  इंसानों से काफी मिलते जुलते हैं। फ़र्क़ सिर्फ इतना है की यह  जिन्न है और वो किसी भी भेष में आ सकते हैं। कभी इंसान की सूरत में, कभी जानवर की सूरत में, तो कभी  चिड़ियाँ की सूरत में, जिन्न का बिल्लियों से तो खैर ख़ास रिश्ता है 


ईदगाह की कच्ची मिटटी की ज़मीन में चिटक पड़ी है चीटियाँ उसी में अपना आबदाना रख रही है