अरमा अंसारी
माँ की गोद से उठना सीखा, माँ के आँचल ने हमेशा हिफाज़त की ज़िन्दगी के कई साल यूँ ही गुज़र गए माँ के आँचल के छावं के तले,ये बच्चे ज़िन्दगी को चैन से गुजारते रहे ।
शायद इन बच्चों को ख़्वाब मै भी अंदाज़ा न था । कि अपनी माँ कि ममता के आंचल से अलग होते ही इन्हें दुनिया की दुश्वारियों से रूबरू होना पड़ेगा । ये मासूम बच्चे अपनी भूख शांत करने के लिए दूसरों के बर्तन माजने पर मज़बूर है । बालश्रम पर पुरे साल अत्याचार होता है ।रामू छोटू को ऐसा जकड़ा की वो नंगे बदन होटलों पे कप -प्लेट धोने पे मजबूर होते है । चाय की दूकान पर अगर छोटू न हो तो चाय ही न बिक पाए ,भठो पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चे दिन भर वहीँ खेला कूदा करते है ।
देश का भविष्य कहे जाने वाले इन बच्चों का आखिर क्या भविष्य रहेगा ।
क्या इनका बचपन यूँ ही काम के बोझ तले चार दिवारी मै दफ़न हो जाये गा
क्या इन्हें अपना बचपन सवारने और उसे जीने का हक़ नही है ।
दुसरे बच्चों को खेलते- पढ़ते और अपने माता पिता से प्यार पाते हुए देख इन बच्चों के मन मै ख़याल नही आता
माँ की गोद से उठना सीखा, माँ के आँचल ने हमेशा हिफाज़त की ज़िन्दगी के कई साल यूँ ही गुज़र गए माँ के आँचल के छावं के तले,ये बच्चे ज़िन्दगी को चैन से गुजारते रहे ।
शायद इन बच्चों को ख़्वाब मै भी अंदाज़ा न था । कि अपनी माँ कि ममता के आंचल से अलग होते ही इन्हें दुनिया की दुश्वारियों से रूबरू होना पड़ेगा । ये मासूम बच्चे अपनी भूख शांत करने के लिए दूसरों के बर्तन माजने पर मज़बूर है । बालश्रम पर पुरे साल अत्याचार होता है ।रामू छोटू को ऐसा जकड़ा की वो नंगे बदन होटलों पे कप -प्लेट धोने पे मजबूर होते है । चाय की दूकान पर अगर छोटू न हो तो चाय ही न बिक पाए ,भठो पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चे दिन भर वहीँ खेला कूदा करते है ।
देश का भविष्य कहे जाने वाले इन बच्चों का आखिर क्या भविष्य रहेगा ।
क्या इनका बचपन यूँ ही काम के बोझ तले चार दिवारी मै दफ़न हो जाये गा
क्या इन्हें अपना बचपन सवारने और उसे जीने का हक़ नही है ।
दुसरे बच्चों को खेलते- पढ़ते और अपने माता पिता से प्यार पाते हुए देख इन बच्चों के मन मै ख़याल नही आता
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