सोमवार, 16 अप्रैल 2012

कठपुतली

अरमा अंसारी 




देखो आयी, आयी पारो  ।
लाल हरी नीली पारो  ।
कुचे- गलियारों से बोलता हुआ ।
डुगडुगी बजाता हुआ  ।
निकल पड़ा कठपुतली वाला ।
गए ज़माने सारे बीत ।
अब न चले कोई रीत ।
पारो को देख बड़ी मस्तियाँ हुई बचपन मै,
कैसे-कैसे नाच- नाचती ,खुद नाचती सबको  नचाती ।
बोल पड़े सभी बच्चे , वह लाल हरी नीली पारो ।
क्या सुंदर -सुंदर दिखती है । फुदक -फुदक के नाचती है ।
वह लाल हरी नीली पारो ।
ये कला बहुत पुरानी कला है ।अक्सर गावों मे इस कला को दिखाया  जाता था। लेकिन अब ये गावों की गलियों से भी  नही गुजरती । अब गावों से निकल थियेटर, रेडियो, टीवी और फिल्मों के ज़रिये दिखाया जाता है ।कला कभी खत्म नही होती । वह जीवित है ।लेकिन ये कला कठपुतली के नाम से मशहूर है । जब हम कठपुतली का नाम लेते है तो हमारे मन मे सबसे पहले राजस्थानी कठपुतली का ख़याल आता है । जो अलग -अलग राज्य मे इसे अलग -अलग नाम से जाना जाता है । कठपुतली के नाचने की कलाकार हाथों से ही होता है ।
कहानी ,कला कितनी भी पुरानी हो ,लेकिन थियेटर पर उसका अंदाज़ नया  ही होता है । रोशनियों से सजाया जाता है ।लाइट प्रोजेक्टर वगैरह -वगैरह तब ये सब देख लोग भूल जाते है ।की वह हजारों साल कला से रूबरू हो रहे है ।

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