उडी पतंग
लो जी ....
आ-गई पतंगों की बहार , ये डोर पनप रही । इन छोटे - छोटे हाथों मै थम रही है । ये पतंग हवा मै मचल रही है , दिलों मै उमंगें उभर रही है , इधर-उधर नज़रे तलाशती फिर रही है ।
कि कब ... कटेगी ये पतंग ...
कब मिलेगी ये पतंग ...
ज़रा इन्हें भी अपने रंग मै रंग लेने दो ।कहीं ख़ामोशी बिछी हुई है । लेकिन फिर भी ज़ज्बा वही है ।सबकी पतंगों का रंग अलग अलग है , जब मेरी पतंग उडी ।तो सब पतंगों मै घुल मिल गई ।
रंगों की रंगत मै रंगी ये पतंगे ,सभी को खुश रखती है ।चरखे पर लिपटती डोर और रंग बिरंगी पतंगें इसका तो जवाब ही नहीं , इन पतंगों का खेल भी अजीब होता है । कुछ हवा मै उड़ाते है तो कुछ देख कर मज़ा लेते है ये पतंगें आम लोगो की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गई है ।
मै हमेशा की तरह आज भी उड़ रही हूँ ।मै खुश हूँ, आज़ाद हूँ, किसी के बंधन मै कैद नहीं , और आज भी मै सबके दिलों मै जिंदा हूँ ।मेरी दोस्ती सभी से है ।लेकिन खास कर बच्चे मुझे ज्यादा पसंद करते है।
nice ...............
जवाब देंहटाएं