मंगलवार, 25 मार्च 2014

अलंग शिपयार्ड

ये बात २०१२ की थी जब हम भावनगर से अलंग गए थे पहली बार देखा:
 गुजरात में भावनगर से लगभग 50 किमी  दूर अलंग शिपयार्ड में जहाज तोड़ने का काम कर रहे वो मजदूर  दबी कुचली ज़िंदगी जीते हैं। अलंग शिप में आपको बस बड़े-बड़े जहाज या उनका मलबा ही नजर आएगा। हर तरफ लोहे और लकड़ियों का बहुत सारा कबाड़ बड़ी बड़ी मशीने, और जहाजों से निकलने वाला फर्नीचर व  सामान का बड़ा सा बाज़ार लगा था | 
उन जहाजो को देख कर आप  अंदाज़ा नही लगा सकते कि ये वही जहाज़ जो समुद्र का सीना चीर कर बड़ी तेज रफ़्तार से निकलता हैं, और उन मज़दूरों का शरीर देखिये जो जहाज को तोड़ते तोड़ते उनका शरीर जर्जेर हो रहा हैं । उन  जहाजों में  खतरनाक कैमिकल मौजूद होता हैं , जिनसे जहाजो में काम कर रहे मजदूर को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती हैं  काफी नुकसान पहुचता हैं| जहाज के बड़े बड़े औज़ारों से उनके शरीर का कोई भी अंग जब कट जाता हैं तो मालिक उनके दुःख में उनकी मदद के लिए नही आता । बल्कि  मालिक उन्हें धमकी देता हैं कि अगर आप काम पर नही आये तो आप का मेहनताना काट लिया जाएगा !
 कहना बहुत मुशकिल हैं कि ये क्यूँ हो रहा हैं मज़दूरों के साथ, और जो हो रहा हैं तो क्या वो रुकेगा, बहुत सारी दिक्कतें हैं उनसे पूछने के बाद वो यही था कि उनके पास रोज़गार नही हैं घर नही हैं ! इसके अलावा और कोई रोज़गार नही हैं !उनकी रोज़ी रोटी का सवाल हैं  
 गुजरात चमचमाती सड़कों और ऊंची-ऊंची इमारतों बिजली पानी कि तारीफ़ करते  नरेंद्र मोदी देश के हर कोने में कहते हुए नज़र आते हैं लेकिन ऐसा कुछ नही हैं ! ज़रा अलंग शिप  में भी पूछिए उन मज़दूरों से कि विकास  किसका नाम हैं  किसी बन्दे का या किसी उड़ती हुई चिड़िया का या किसी वास्तु का उन्हें नही पता विकास क्या हैं वाइब्रेंट गुजरात क्या हैं वो सिर्फ मौत के मोड़ पर खड़े हैं उन्हें कोई उम्मीद नज़र नही आती !!   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें