चाय का प्याला हो या प्याली चाय पीने का मज़ा तो कुल्हड़ में ही हैं। जब दिगती हुई भट्टी से चाय की केतली उतरती, तब उस कुल्हड़ में चाय डालने के बाद चाय सौंधी सौंधी खुश्बू के साथ जायके दार हो जाती थी, ये कुल्हड़ बनाने वाला भी बहुत हुनर मंद था, अलग अलग डिज़ाइन में तैयार करते हर तरह के बर्तन, और एक तरह से कुम्हार को अंदाज़ा भी होता था, कि मिटटी के बर्तन बनाने के लिए मिट्ठी कैसी होनी चाहिए,तभी इतने खूबसूरत कुल्हड़ उनकी चाक से उतरते थे। ज्यादातर तो कुल्हड़ की ही मांग होती थी। चाक से उतारते ही उनके कुल्हड़ बिक जाते थे, वो रात को मिटटी के बर्तन पकाने के बाद सुबह या दोपहर तक चाय की कितली पर पंहुचा देते थे। जिससे उनकी रोजी रोटी का आसरा मिल जाता था। धीरे धीरे इनकी तलाश कम होती जा रही हैं। शायद कहीं इक्का - दुक्का जगह दिख जाए नही तो अब लोग प्लास्टिक ग्लास में चाय पीने लगे हैं। जिससे कुल्हड़ का चलन ख़त्म हो रहा हैं। वह ग्लास जो बच्चो के खिलौने जैसे दिखते हैं। और वह प्लास्टिक ग्लास वाली चाय कहीं ५- तो कहीं १० रूपये की मिल पाती हैं जिसमें दो घूँट चाय जैसे उबलता पानी,न जायका न पत्ती वैसे देखा जाए तो चाय दुनिया भर में अलग अलग तरीके से बना के पीते हैं कॉफी मसाला चाय हरी चाय नींबू या आड़ू की चाय, कुछ इस तरह चाय लोगो का मन लुभा रही हैं,लेकिन सच तो यह है, कि कुल्हड़ वाली चाय से भारत कि पहचान को दर्शाता हैं ।
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