मंगलवार, 4 जुलाई 2017

अख़बार

 अख़बार दरवाज़े पर  दुनियां का हवाला देने आ जाया करती थी, उर्दू के अख़बार में लफ़्ज़ बड़ी ही ख़ूबसूरती से पेश किये जाते है, ख़बर  दुःख बतलाये या सुख, ख़ैर सुबह के बाद सियासत से बेख़बर हो जाते मतब का समय होता, शेरवानी  सफ़ेद पैजामा और एक हाथ में छड़ी  दूसरे हाथ में टिफिन का झोला और स्कूटर से चले जाते, उधर कुम्हार अपने मिट्टी के बनाये बर्तन पकाने के लिए आवां तैयार कर रहे होते , पास में सफ़ी मियां ८० -९० साल के  बकरियों को पालने का शौक़ रखने वाले उनके नाम भी रखते सुबह सुबह उन्हें ऊँची आवाज़ में बुलाते  रोटी और चाय से सुबह शुरू होती! उधर ख़ान साहब पुरानी कोठरी में रहे रहे सुबह-सुबह जग जाते कि कहीं कोई बच्चे छोटे पेड़  उखाड़  तो नहीं ले गए,  कहीं डर कहीं ख़ुशी तो कहीं मासूमियत का ज़बरदस्त हवाला तो जरूर होता था उस दौर,  हमारे आसपास की कहानियों का,  गाँवों में सुकून तो होता है, लेकिन बेहतर हालात नही,  आज के दौर में हिंस्दुस्तान में बसे अलग अलग जगहों पर रह रहे मज़दूर दलित किसानों पर ये विकास की पोटली कुछ ज्यादा ही भारी पड़ गई,  ये वही किसान जो मुंशी  प्रेम चंद का  सबसे बड़ा कारनामा ये रहा, कि उन्होंने हमेशा नाविलों और  अफ़सानो में किसानों को अपना हीरो बनाया ! देहात गाँवों के मशाइल पर कलम उठाया और  लिख डाला पूस की रात, गोदान जैसे नाविलों को, सच तो ये है आज भी जो लोग गाँवों के बारे में अच्छी  बातें बतियाते है उनका नज़रया सिर्फ दूर से देखने का है, या सियासी तौर से इस्तेमाल करते है,
वरना इनके ज़हन में भेदभाव  और नफरत के अलावा कुछ नहीं है, गाँधी और नेहरू की विरासत को छीना हैं, इतिहास के पन्नों को तहस नहस करने पर तुले हुए हैं,
  

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