सोमवार, 7 अगस्त 2017

“दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता: मुंशी प्रेम चंद

 आज के दौर में हिंस्दुस्तान में बसे अलग अलग जगहों पर रह रहे मज़दूर दलित किसानों पर ये विकास की पोटली कुछ ज्यादा ही भारी पड़ गई, यहां तक आम लोगों को भी, ये वही गाँवो के लोग और किसान जो मुंशी  प्रेम चंद का  सबसे बड़ा कारनामा ये रहा, कि उन्होंने हमेशा नाविलों और  अफ़सानो में किसानों को अपना हीरो बनाया ! देहात गाँवों के मशाइल पर कलम उठाया और  लिख डाला पूस की रात, गोदान जैसे नाविलों को लेकिन आज हालात  बेहतर नहीं हैं, और इन लोगो से उम्मीद भी क्या की जा सकती है, जिनके ज़हन में भेदभाव  और नफरत के अलावा कुछ नहीं है, गाँधी और नेहरू की विरासत को छीना हैं, और जश्न मनाते हैं, वरना जनता को लुभाने के लिए मोदी पार्टी के पास है ही क्या, अलावा इसके  दंगा और एनकाउंटर, वरना इनकी मंशा इतिहास के पन्नों को तहस नहस करना है! भारत के सविंधान से दिक्कत है जनगण मन से दिक्कत है !
और भारत के पूर्वजों को राजनीती में इस्तेमाल यही लोग करते है !
दिल्ली में नगर निगम चुनाव  के दौरान रामलीला मैदान में पंच-परमेशवर नाम का सम्मेलन किया था
छोटा सा टुकड़ा  पंच-परमेशवर का - 
“दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पंच के दिल में खुदा बसता है।” 
 सच तो ये है आज भी जो लोग गाँवों के बारे में अच्छी  बातें बतियाते है उनका नज़रया सिर्फ दूर से देखने का है, या सियासी तौर से इस्तेमाल करते है




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें