रात अंधेरी खिड़की में कोई राग-आल्हा जपता है
कहीं गहरा समन्दर झूमता है
कहीं राधा का पनघट सूखता है
ये इमारतें आसमा चूमती है
किसी कागज़ पर नस्लों की विरासत छपती है
लोबान की धूनी का धुवाँ उड़ाता
कोई फ़कीर खुदा की दुहाई देता है
कोई बहार जंगल की कोख में पलती है
किसी माली का पेट भरती है
उसकी चमक मंदिर मस्जिद गीरजाघर में फूलों के चमन से होती
कोई राग यही बातलाता है ना वक़्त लौट कर आता है
कहीं गहरा समन्दर झूमता है
कहीं राधा का पनघट सूखता है
ये इमारतें आसमा चूमती है
किसी कागज़ पर नस्लों की विरासत छपती है
लोबान की धूनी का धुवाँ उड़ाता
कोई फ़कीर खुदा की दुहाई देता है
कोई बहार जंगल की कोख में पलती है
किसी माली का पेट भरती है
उसकी चमक मंदिर मस्जिद गीरजाघर में फूलों के चमन से होती
कोई राग यही बातलाता है ना वक़्त लौट कर आता है
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