वोह घर पतली गालियों में पुरानी ईमारतों में छूपा !
सूखी टेहनियों की छाँव से ढ़का !
कहीं-कहीं टूटी ईटें झांक रही हैं !
कहीं डांसर की तरह लम्बी लकडियां गिरती दिवारों को साधे खड़ी हैं !
कोने में धूल सिमटी हुई है !
खिड़कियां मकड़ी के जाल से बुनी हुई है !
आंगन की दीवारों पर पेडों का घराना बस रहा है !
सादियों से लगे सदर दरवाज़े की लकडियां खुशक हो रही हैं
जो कुछ बचे है वोह संदूक और डालिया में सपने
सूईं धागे वाली डालिया में खतों के सिलसिले रुके पडे हैं
नानी- दादी के किस्से संजोये हुये हैं !
कुछ पुराने ख़तों को दीमक खा गए हैं !
जैसे सूईं में रेशम के धागे पिरोये हुयें हैं !
बिना बटन के खादी की सीदरी जाने कब से संदूक में रखी हुई है जिसमे काज बनना बाकी हैं
कह दो उन टूटी दीवारों से मेरा इंतिजार ना करें आऊँ गी कभी फुरसत से बहुत सी बातों को समेटने
8 नवम्बर 2018
अरमा नफीसा अंसारी
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