रमजान का महीना है ऐसे वक़्त में लखनऊ और बाराबंकी की याद आती है कितना भी मन बहलाने के लिए बाटला हाउस और पुरानी दिल्ली घूम लो वोह बात नहीं है जो लखनऊ के शहर अमीनाबाद में है लेकिन लखनऊ भी काफी बदल चूका है वह १५ साल पहले वाले उर्दू लफ्ज़ सुनाई नहीं देते मेरे नाना बताते हैं जब वह तिब्बिया कॉलेज में पढ़ते थे चौक अक्सर टुंडे कबाब खाने जाया करते थे उस दौर के लफ्ज़ आज भी कानो में गूंजते हैं जब उसे बोलते थे लखनवीं ज़ुबां
शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021
शनिवार, 10 अप्रैल 2021
रविवार, 4 अप्रैल 2021
बचपन और ज़माना
चलो फिर से हँसते हँसते लोट-पोट हो जाए
फिर बचपन की तरह आँखों में खुशियों के आँसू छलक जाए
फिरोज़ी आसमान के नीचे बैठे, हरी मख़मली चादर पर
बचकानी हरक़तें कर हरी घास की पंखुरी चबाएं
पिंक स्वेटर को उतारते हुए नीचे सर रखने के लिए तकिया बनाते हुए औंधे मुंह लेट जाए
करू दूँ हवाले गुनगुनी धुप के, अपने तन के कुछ हिस्से
और फिर सूरज पर मूँदती आँखें गड़ोए सूरज से टकराये मेरी आंखें
ना कल की फिक्र हो न ज़माने की परवाह
बड़बोले लफ़्ज़ों में हो न हो कोई वजह
फिर बचपन की तरह आँखों में खुशियों के आँसू छलक जाए
फिरोज़ी आसमान के नीचे बैठे, हरी मख़मली चादर पर
बचकानी हरक़तें कर हरी घास की पंखुरी चबाएं
पिंक स्वेटर को उतारते हुए नीचे सर रखने के लिए तकिया बनाते हुए औंधे मुंह लेट जाए
करू दूँ हवाले गुनगुनी धुप के, अपने तन के कुछ हिस्से
और फिर सूरज पर मूँदती आँखें गड़ोए सूरज से टकराये मेरी आंखें
ना कल की फिक्र हो न ज़माने की परवाह
बड़बोले लफ़्ज़ों में हो न हो कोई वजह
फुर्शत मिले जाए तो क़लम को दांतों के तले दबाते हुए उन लफ़्ज़ों को ढूंढ लाऊँ
जो मेरी डायरी में एक दम सटीक बैठ जाए
और स्याही भी उतनी ही रफ़्तार में बुन लेती है कई वजह
कहानियां ज़िद्दी हो तो काग़ज़ पर अपनी जगह बना लेती है
फिर ज़माना कोई भी हो
अरमा अंसारी
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