रमजान का महीना है ऐसे वक़्त में लखनऊ और बाराबंकी की याद आती है कितना भी मन बहलाने के लिए बाटला हाउस और पुरानी दिल्ली घूम लो वोह बात नहीं है जो लखनऊ के शहर अमीनाबाद में है लेकिन लखनऊ भी काफी बदल चूका है वह १५ साल पहले वाले उर्दू लफ्ज़ सुनाई नहीं देते मेरे नाना बताते हैं जब वह तिब्बिया कॉलेज में पढ़ते थे चौक अक्सर टुंडे कबाब खाने जाया करते थे उस दौर के लफ्ज़ आज भी कानो में गूंजते हैं जब उसे बोलते थे लखनवीं ज़ुबां
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें