उलझने हमेशा उलझनों को जन्म देती
कमबख़्त ये समझती कहां है
चुनांचा इनसे इनका ज़िक्र करना लाज़मी है
अपने लफ़्ज़ों में सफ़ेद कागज़ पर
अरमा
मशरीख़ मग़रिब सुमाल जुनूब
लम्हा इन्ही चारों दिशाओं के इर्द गिर्द है
लम्हा ज़िद्दी है बढ़ रहा है रुकने का नाम नहीं
कल आया कौन आया कौन मिला कौन बिछड़ा पता नहीं
कौन सा दिन आया कौन सा दिन गया सिर्फ उँगलियों पर गिनते है
वक़्त समुन्दर की लहरों की तरह उमड़ रहा है
नदियों झीलों के किनारे शाम की सुर्खिया फ़ीकी पड़ रही थी
काली रातें जुगनुओं की रौशनी से खूबसूरत लग रही है
हवाएं बखूबी से अपना परचम लहरा रही है
~अरमा अंसारी