शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

मशरीख़ मग़रिब सुमाल जुनूब

 मशरीख़ मग़रिब  सुमाल  जुनूब 

लम्हा इन्ही चारों दिशाओं के इर्द गिर्द है 

लम्हा ज़िद्दी है बढ़ रहा है रुकने का नाम नहीं 

कल आया कौन आया कौन मिला कौन बिछड़ा पता नहीं 

कौन सा दिन आया कौन सा दिन गया सिर्फ उँगलियों पर गिनते है 

वक़्त समुन्दर की लहरों की तरह उमड़ रहा है 

नदियों झीलों के किनारे शाम की सुर्खिया फ़ीकी पड़ रही थी

काली रातें जुगनुओं की रौशनी से खूबसूरत लग रही है 

हवाएं बखूबी से अपना परचम लहरा रही है 

~अरमा अंसारी 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें