गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

कुछ ख़्वाहिशों को कागज़ के हवाले करते हैं

कुछ ख़्वाहिशों को कागज़ के हवाले करते हैं 

कुछ दिल में नए रंग में ढलते हैं 

कुछ ख़्वाहिशें ख़्वाबों का समां बांधती है 

कुछ ख़्वाहिशें नया जनम लेती है 

कुछ हमारे अपनों से मिल लेती है ये  ख़्वाहिशें

कमबख़्त ये बताती कहाँ सारा दुनिया घूम लेती 

हमारे यही रहते जाने कितने पन्नों को लिख डालती है 

रात वाली काली चादर के तले सितारों से नज़रे मिलती 

ख़्वाहिशें कभी कभी तो उसके पास से हो कर आ जाती है  

लेकिन में देख सकता हूँ बस मेरे आसपास क़ुदरत की बनायीं जुगनुओ की रौशनी 

कभी कभी मेरे तकिया के पास आती है मेरे अच्छे वाले ख़्वाब  बनकर  

तकिये के तले छुप जाती है आँख मचोली खेलती है 

कभी दाएं कभी बाएं कभी ऊपर कभी नीचे फिर चली जाती है 

फिर चली जाती है एक समां बना कर 

 



अरमा नफीसा 

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