मैं उठी तुझे देखन चली फूलों के बहार में
कि ख़ुसरो के चाहने वाले आये है
इसी गुलाबी मौसम के बहार में
जब में खुसरो के आँगन जा बैठी चिराग़ जलाने
अब चिराग़ क्या जलाये जब हवाएं तेज़ हुई
अगरबत्तियां भी क़तार में
मुश्किल से चिराग़ जला भी
तो मन्नत की अगरबत्तियां
तो कुछ ही देर में जल कर सब ख़ाक हो गई
जब खाक़ गिरी चिराग़ से नीचे तो ख़ाक हो गई मिटटी
देख ख़ुसरो पिया भर गया तेरा आंगन चाहने वालों से
फिर उन्हें हवाओं की क्या फ़िक्र
देखो मौसम आया रंगों के बहार से
मैं भी बैठ गई आँगन में ख़ुसरो के
जो आँगन रंगों के त्यौहार में था
अरमा नफीसा
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