कहानियां कोई मन गढ़ंत कहानियां नही होती । खुद की कहानी जब खुद को सुनाती है तो अच्छी लगती है ।ये ज़िन्दगी है जरुरी नहीं होता ,कि ज़िन्दगी के हर पल सुकून से ही कटते हो । कभी मुश्किले पड़ती है तो रास्ता चलना मुश्किले पड़ जाता है ...!!!
सोमवार, 17 दिसंबर 2012
बुधवार, 1 अगस्त 2012
आज़ादी क्या है
मैने अपनी सारी ज़िन्दगी इसी शहर में बितायी । इन 20 सालों मैं इसे झुकते गिरते ,संभलते हसते, और कई सारी बार रोते देखा है । इतने सारे सालों मै अगर कुछ नहीं बदला । तो इस शहर से प्यार, मेरा इसके बेह्तर मैं विश्वास, इन कई सालों से सैलाब का गुज़रना और उम्मीद की रोशनी का फिर मुस्कुराना ।गुजरात में नियत है ,पर वो बार बार डर के सामने झुकती घिसती नज़र आती है । पर ये भाव विरेचन का समय काल चल रहा है । इससे गुज़र कर गुजरात सर उठाकर एक नयी शुरुआत करेगी ।जहाँ हर किसी की आवाज़ बुलंद होगी । और सब अपने मन के सरताज होंगे ।
कभी कभी सोचती हूँ ,जब ये मन कुछ पलों के लिए सहम जाता है ।अपने विश्वास पर संदेह करता है । कि शायद मैं ग़लत हूँ । पर ये लोग तो ग़लत नहीं। ये कोई गुनाहगार ,कोई अपराधी नहीं ,तो ये मैं क्यूँ जले । जब दुःख की जलती रोशनी नज़र नहीं आती , मैं अपने मन पर फिर विश्वास करने लगती हूँ । इनके लिए एक बेहतर कल की उम्मीद करती हूँ । अपने लिए एक बेहतर कल की उम्मीद करती हूँ ।
आज़ादी क्या है ? अनेक इंसानों के लिए इसके अनेक है । कोई इसे अपनी कला में , तो कोई अपने कपड़ों में, कोई रहने के ढंग में, तो कोई जीने के रंग में देखता है ।किसी के लिए ये आवाज़ तो किसी के लिए अंदाज़ है ।में बीएस इतना सोचती हूँ ,कि आज़ादी एक और सुखी और स्वास्थ्य जीवन हैं । जहाँ न डर का कोहरा है । न महंगाई का पहरा जहाँ इन्साफ हो ।
माँ कहा करती थी ,सुन्दरता जीवन में है ,तो आस पास को सुंदर मन अपने आप बना लेता है । इंसान को विशालकाय इमारतों की नही कोई बाग़ बगीचा उसे नहीं कर सकता , जब तक की वो मन से नहीं विकाश शायद सीमेंट की में नहीं , पर आम की बेसिक जरूरतों में है । घर स्वचछ इलाका , पानी और स्वास्थय में है । एक साचार समाज में है ।
लोकतंत्र इस शब्द का मूल ही लोग है ।जनता है ,इन्ही आजादियों से ही ये शब्द बनता है ।रात के अंधेरों मई राहत देती चाँद की रोशनी भी तो उम्मीद के सूरज से है ।कल रोशन होगा ,अपने हकों के उजालों से ना की डर के परों तले दबी समझोते से , लोग उपर उठ कर इस प्रदेश को चलायेंगे अपने हकों के बालों से नयी दुनियां बनायेगे ।
कभी कभी सोचती हूँ ,जब ये मन कुछ पलों के लिए सहम जाता है ।अपने विश्वास पर संदेह करता है । कि शायद मैं ग़लत हूँ । पर ये लोग तो ग़लत नहीं। ये कोई गुनाहगार ,कोई अपराधी नहीं ,तो ये मैं क्यूँ जले । जब दुःख की जलती रोशनी नज़र नहीं आती , मैं अपने मन पर फिर विश्वास करने लगती हूँ । इनके लिए एक बेहतर कल की उम्मीद करती हूँ । अपने लिए एक बेहतर कल की उम्मीद करती हूँ ।
आज़ादी क्या है ? अनेक इंसानों के लिए इसके अनेक है । कोई इसे अपनी कला में , तो कोई अपने कपड़ों में, कोई रहने के ढंग में, तो कोई जीने के रंग में देखता है ।किसी के लिए ये आवाज़ तो किसी के लिए अंदाज़ है ।में बीएस इतना सोचती हूँ ,कि आज़ादी एक और सुखी और स्वास्थ्य जीवन हैं । जहाँ न डर का कोहरा है । न महंगाई का पहरा जहाँ इन्साफ हो ।
माँ कहा करती थी ,सुन्दरता जीवन में है ,तो आस पास को सुंदर मन अपने आप बना लेता है । इंसान को विशालकाय इमारतों की नही कोई बाग़ बगीचा उसे नहीं कर सकता , जब तक की वो मन से नहीं विकाश शायद सीमेंट की में नहीं , पर आम की बेसिक जरूरतों में है । घर स्वचछ इलाका , पानी और स्वास्थय में है । एक साचार समाज में है ।
लोकतंत्र इस शब्द का मूल ही लोग है ।जनता है ,इन्ही आजादियों से ही ये शब्द बनता है ।रात के अंधेरों मई राहत देती चाँद की रोशनी भी तो उम्मीद के सूरज से है ।कल रोशन होगा ,अपने हकों के उजालों से ना की डर के परों तले दबी समझोते से , लोग उपर उठ कर इस प्रदेश को चलायेंगे अपने हकों के बालों से नयी दुनियां बनायेगे ।
शनिवार, 26 मई 2012
हल्का सा झोंका
अरमा अंसारी
इन कोरे-कोरे कागज पर इक नई कहानी में लिखना चाहूं ।
बड़ी सुहानी रात अँधेरी चली हवाएं टिप - टिप बारिश ,
टिमटिमाते जुगनू संग ये बयां करूँ ।
सोमवार, 16 अप्रैल 2012
कठपुतली
अरमा अंसारी
देखो आयी, आयी पारो ।
लाल हरी नीली पारो ।
कुचे- गलियारों से बोलता हुआ ।
डुगडुगी बजाता हुआ ।
निकल पड़ा कठपुतली वाला ।
गए ज़माने सारे बीत ।
अब न चले कोई रीत ।
पारो को देख बड़ी मस्तियाँ हुई बचपन मै,
कैसे-कैसे नाच- नाचती ,खुद नाचती सबको नचाती ।
बोल पड़े सभी बच्चे , वह लाल हरी नीली पारो ।
क्या सुंदर -सुंदर दिखती है । फुदक -फुदक के नाचती है ।
वह लाल हरी नीली पारो ।
ये कला बहुत पुरानी कला है ।अक्सर गावों मे इस कला को दिखाया जाता था। लेकिन अब ये गावों की गलियों से भी नही गुजरती । अब गावों से निकल थियेटर, रेडियो, टीवी और फिल्मों के ज़रिये दिखाया जाता है ।कला कभी खत्म नही होती । वह जीवित है ।लेकिन ये कला कठपुतली के नाम से मशहूर है । जब हम कठपुतली का नाम लेते है तो हमारे मन मे सबसे पहले राजस्थानी कठपुतली का ख़याल आता है । जो अलग -अलग राज्य मे इसे अलग -अलग नाम से जाना जाता है । कठपुतली के नाचने की कलाकार हाथों से ही होता है ।
कहानी ,कला कितनी भी पुरानी हो ,लेकिन थियेटर पर उसका अंदाज़ नया ही होता है । रोशनियों से सजाया जाता है ।लाइट प्रोजेक्टर वगैरह -वगैरह तब ये सब देख लोग भूल जाते है ।की वह हजारों साल कला से रूबरू हो रहे है ।
देखो आयी, आयी पारो ।
लाल हरी नीली पारो ।
कुचे- गलियारों से बोलता हुआ ।
डुगडुगी बजाता हुआ ।
निकल पड़ा कठपुतली वाला ।
गए ज़माने सारे बीत ।
अब न चले कोई रीत ।
पारो को देख बड़ी मस्तियाँ हुई बचपन मै,
कैसे-कैसे नाच- नाचती ,खुद नाचती सबको नचाती ।
बोल पड़े सभी बच्चे , वह लाल हरी नीली पारो ।
क्या सुंदर -सुंदर दिखती है । फुदक -फुदक के नाचती है ।
वह लाल हरी नीली पारो ।
ये कला बहुत पुरानी कला है ।अक्सर गावों मे इस कला को दिखाया जाता था। लेकिन अब ये गावों की गलियों से भी नही गुजरती । अब गावों से निकल थियेटर, रेडियो, टीवी और फिल्मों के ज़रिये दिखाया जाता है ।कला कभी खत्म नही होती । वह जीवित है ।लेकिन ये कला कठपुतली के नाम से मशहूर है । जब हम कठपुतली का नाम लेते है तो हमारे मन मे सबसे पहले राजस्थानी कठपुतली का ख़याल आता है । जो अलग -अलग राज्य मे इसे अलग -अलग नाम से जाना जाता है । कठपुतली के नाचने की कलाकार हाथों से ही होता है ।
कहानी ,कला कितनी भी पुरानी हो ,लेकिन थियेटर पर उसका अंदाज़ नया ही होता है । रोशनियों से सजाया जाता है ।लाइट प्रोजेक्टर वगैरह -वगैरह तब ये सब देख लोग भूल जाते है ।की वह हजारों साल कला से रूबरू हो रहे है ।
रविवार, 15 अप्रैल 2012
आखिर छोटू ही क्यों चाय वाला ...
अरमा अंसारी
माँ की गोद से उठना सीखा, माँ के आँचल ने हमेशा हिफाज़त की ज़िन्दगी के कई साल यूँ ही गुज़र गए माँ के आँचल के छावं के तले,ये बच्चे ज़िन्दगी को चैन से गुजारते रहे ।
शायद इन बच्चों को ख़्वाब मै भी अंदाज़ा न था । कि अपनी माँ कि ममता के आंचल से अलग होते ही इन्हें दुनिया की दुश्वारियों से रूबरू होना पड़ेगा । ये मासूम बच्चे अपनी भूख शांत करने के लिए दूसरों के बर्तन माजने पर मज़बूर है । बालश्रम पर पुरे साल अत्याचार होता है ।रामू छोटू को ऐसा जकड़ा की वो नंगे बदन होटलों पे कप -प्लेट धोने पे मजबूर होते है । चाय की दूकान पर अगर छोटू न हो तो चाय ही न बिक पाए ,भठो पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चे दिन भर वहीँ खेला कूदा करते है ।
देश का भविष्य कहे जाने वाले इन बच्चों का आखिर क्या भविष्य रहेगा ।
क्या इनका बचपन यूँ ही काम के बोझ तले चार दिवारी मै दफ़न हो जाये गा
क्या इन्हें अपना बचपन सवारने और उसे जीने का हक़ नही है ।
दुसरे बच्चों को खेलते- पढ़ते और अपने माता पिता से प्यार पाते हुए देख इन बच्चों के मन मै ख़याल नही आता
माँ की गोद से उठना सीखा, माँ के आँचल ने हमेशा हिफाज़त की ज़िन्दगी के कई साल यूँ ही गुज़र गए माँ के आँचल के छावं के तले,ये बच्चे ज़िन्दगी को चैन से गुजारते रहे ।
शायद इन बच्चों को ख़्वाब मै भी अंदाज़ा न था । कि अपनी माँ कि ममता के आंचल से अलग होते ही इन्हें दुनिया की दुश्वारियों से रूबरू होना पड़ेगा । ये मासूम बच्चे अपनी भूख शांत करने के लिए दूसरों के बर्तन माजने पर मज़बूर है । बालश्रम पर पुरे साल अत्याचार होता है ।रामू छोटू को ऐसा जकड़ा की वो नंगे बदन होटलों पे कप -प्लेट धोने पे मजबूर होते है । चाय की दूकान पर अगर छोटू न हो तो चाय ही न बिक पाए ,भठो पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चे दिन भर वहीँ खेला कूदा करते है ।
देश का भविष्य कहे जाने वाले इन बच्चों का आखिर क्या भविष्य रहेगा ।
क्या इनका बचपन यूँ ही काम के बोझ तले चार दिवारी मै दफ़न हो जाये गा
क्या इन्हें अपना बचपन सवारने और उसे जीने का हक़ नही है ।
दुसरे बच्चों को खेलते- पढ़ते और अपने माता पिता से प्यार पाते हुए देख इन बच्चों के मन मै ख़याल नही आता
रविवार, 19 फ़रवरी 2012
गोधरा कांड
अरमा अंसारी
जाना । २७ फ़रवरी सन 2002 को गोधरा मे ट्रेन जलाई गई । उसके दुसरे दिन कुछ लोगो ने मुसलमानों पर हमला बोल दिया । हमला करने वालो ने ये नही सोचा कि भला ये मासूम किसी का क्या बिगाड़ेगे
जिन मासूमों को इन लोगो ने जिन्दा आग के हवाले किया । उनको को तो दुनियां में आये हुए एक साल
एक महिना या एक दिन ही हुआ होगा । सन २००२ के गोधरा कांड से आज भी लोग उस हादसे से बाहर
नही निकल पांए है । तमाम अपनों से बिछड़ कर घर से बेघर हुए । किसी को जिन्दा जलाया तो किसी को
तलवार कि धार का निशाना बनाया ।
बड़ी मुद्दत मे ये गलियां मुस्कुरायीं है !
हाँ ये सच है । कि वो सूनी गलियां जो दहशत
से भरी थी । और दहशत मे थे लोग । ये मै नही ये वो लोग कह रहे है । जिन लोगो ने अपनों को लुटते हुए देखा है ।अपनी ही आँखों से अपने कलेजे को तड़फते हुए देखा है | लेकिन दस साल के बाद भी वो अपनों को भुला नही पाए । और शायद भूल भी नही पायेंगें । क्यूंकि आज १० साल के बाद भी वो दुःख भरी दास्ताँ अपनी - अपनी जुबान से बयां नही कर पातें । जब हमने एक औरत से इस हवाले के बारे मै जानना चाहा। तो वो सब बताने से पहले उसकी पलके भीग गई । क्यूंकि वो वाक्या उसकी नज़रों के सामने तुरंत आ गया । उसकी १५ साल कि बच्ची का रेप कर उस माँ के सामने मार डाला गया । वह माँ चीख कर रह गई । लेकिन कुछ नहीं कर पाई । ऐसे कई परिवार थे ऐसी कई माँ थी । जिन्होंने अपनी औलाद को जिन्दा ही जलते कटते मरते देखा है । न जाने क्यूँ जिंदगी का सफ़र ऐसा क्यूँ जरुरी होता है । उनका खुलकर बाहर आना - माहिया कहती है । कि अब डर किस बात का डरते -डरते अपनों को खो चुकी हूँ ? अब तो मेरा कोई नही है । और हर चीज़ का सामना मै खुद करती हूँ ? सारी बहनों कि मदद करती हूँ और आगे करती रहूँ गी
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