बरसात की भीनी - भीनी सी खुशबू गरजते - बरसते बादल के तले जब होती थी,किलकारिओं कि गूंज, अब आ गए बिन बुलाये मेहमान,शोर मचाते आँख दिखाते,घनघोर घटा सी छा जाती । फिर हमारे आँगन में आते | हमारे अच्छे दोस्त बन जाते । खूब नहाते, बातें करते, संग - संग जाने कितनी मस्ती करते | कितने सपनो को बटोरते,अचानक से जाने कब चली गई ये बारिश, छोड़ गई कुछ हल्की- हल्की बुँदे ! टपकती थी, पूस से रंग बिरंगी बूँदें , और बचे थे मेरे आांगन में बस मेरे छोटे छोटे पाँव के निशान , हाँ कुछ तो बाकी थी बूंदें ,कुछ ख़ामोशी सी छा गई । मुझे कुछ कहना था , करनी थी, कुछ बातें |
सोमवार, 9 दिसंबर 2013
बुधवार, 18 सितंबर 2013
जहांगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट
साल गए, बीत गए, बात गई । लेकिन यादों का सिलसिला अभी भी जारी है , भला उन्हें कौन भुलाना चाहेगा , मन मुस्कुराता है , मुस्कुरा कर फिर यही बोलता हैं ये कमबख्त मन "दोस्त" दोस्तों की यादें टीचर्स , टीचर्स की बातें । और भी बहुत कुछ, अरे हाँ मै तो कहना ही भूल गई जिसकी बात करने जा रही थी ।
बात दरअसल २०११ की है ।जब हम सभी दोस्त जहांगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट पढ़ रहे थे । काफी ठण्ड थी वह भी उत्तर प्रदेश की ठण्ड, क्या कहना कितने भी कपडे पहन लो । ठण्ड भागने का नाम ही नही लेती मुह में गमछा लपेट लो फिर भी मुह से भाप निकलती हैं , आग जला कर बैठे रहे, उठने का मन ही नही करता , मेरे सभी दोस्तों को फोटोग्राफी का बड़ा शॊक था । जाने कब निकल जाये पता नही सुबह शाम, बारिश और फिर ठण्ड अच्छा मौसम था , उस वक़्त धान की फसल की शुरुआत हो जाती हैं सभी अपने अपने खेत में बीयोर लगाना शुरू कर देते हैं । जे एम् आई के पास ही काफी बड़ा मैदान, आम के बगीचे । उसी के पास पुराना स्कूल था । और पास में ही बड़ी बड़ी सारंस पंखो को फड़फडाते हुए आवाज़ करते हुए कितना अच्छा लगता था । ये सब देख कभी भी मन बोर नही होता था ,खेत में काम करते लोग और चरवाह । भाई क्या कहना इस मौसम का तो जवाब नही हल्क़े - हल्क़े ओले पड़ रहे थे । अब जब ठान ही लिया हैं । कि फोटोग्राफी करनी हैं तो करनी हैं ,निकल पड़े हम सारे दोस्त फोटोग्राफी के लिए , शाम के ४ बज गए, पता ही नही चला ठण्ड तो थी ही, हवाएं भी चल रही थी । अब चाय पीने का मन कर रहा था । जाये भी तो कहाँ , पास में ही एक गाँव था । लेकिन हम किसी को जानते नही थे । गाँव के पास बच्चे ताप रहे थे ,हम जा कर उनसे बात करने लगे। धीरे धीरे बात आगे बढ़ी और आंटी ने सामने से प्रस्ताव रखा चलो हमारे घर नही चलो गे चाय पी लो ठण्ड बहुत हैं । लो जी हो गई मन की बात फिर क्या था । न तो नही कर सकते अब हाँ भी नहीं कर सकते । दोस्त ने कहा नही- नही आंटी हम जा ही रहे हैं । हमें कुछ काम हैं । आंटी बोली - तो क्या हमारे गाँव नही चलोगे देखो आप लोग चाय भी पी लो फोटोग्राफी भी कर लेना । तो ठीक हैं आप कह रही हैं तो चलो । और हम सब उनके साथ उनके घर गए ।
चाय पी और उनके परिवार वालों से मिले अच्छा लगा । ये वही फोटो हैं । जब सब फोटोग्राफी के लए निकले थे । यहाँ एक आदमी अकेला बैठ कर ताप रहा था । और दूर खड़े हैं सारे दोस्त बातें करते हुए जा रहे थे । ये फोटो उस जगह की उस वक़्त की आज भी याद दिलाती है !!
बात दरअसल २०११ की है ।जब हम सभी दोस्त जहांगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट पढ़ रहे थे । काफी ठण्ड थी वह भी उत्तर प्रदेश की ठण्ड, क्या कहना कितने भी कपडे पहन लो । ठण्ड भागने का नाम ही नही लेती मुह में गमछा लपेट लो फिर भी मुह से भाप निकलती हैं , आग जला कर बैठे रहे, उठने का मन ही नही करता , मेरे सभी दोस्तों को फोटोग्राफी का बड़ा शॊक था । जाने कब निकल जाये पता नही सुबह शाम, बारिश और फिर ठण्ड अच्छा मौसम था , उस वक़्त धान की फसल की शुरुआत हो जाती हैं सभी अपने अपने खेत में बीयोर लगाना शुरू कर देते हैं । जे एम् आई के पास ही काफी बड़ा मैदान, आम के बगीचे । उसी के पास पुराना स्कूल था । और पास में ही बड़ी बड़ी सारंस पंखो को फड़फडाते हुए आवाज़ करते हुए कितना अच्छा लगता था । ये सब देख कभी भी मन बोर नही होता था ,खेत में काम करते लोग और चरवाह । भाई क्या कहना इस मौसम का तो जवाब नही हल्क़े - हल्क़े ओले पड़ रहे थे । अब जब ठान ही लिया हैं । कि फोटोग्राफी करनी हैं तो करनी हैं ,निकल पड़े हम सारे दोस्त फोटोग्राफी के लिए , शाम के ४ बज गए, पता ही नही चला ठण्ड तो थी ही, हवाएं भी चल रही थी । अब चाय पीने का मन कर रहा था । जाये भी तो कहाँ , पास में ही एक गाँव था । लेकिन हम किसी को जानते नही थे । गाँव के पास बच्चे ताप रहे थे ,हम जा कर उनसे बात करने लगे। धीरे धीरे बात आगे बढ़ी और आंटी ने सामने से प्रस्ताव रखा चलो हमारे घर नही चलो गे चाय पी लो ठण्ड बहुत हैं । लो जी हो गई मन की बात फिर क्या था । न तो नही कर सकते अब हाँ भी नहीं कर सकते । दोस्त ने कहा नही- नही आंटी हम जा ही रहे हैं । हमें कुछ काम हैं । आंटी बोली - तो क्या हमारे गाँव नही चलोगे देखो आप लोग चाय भी पी लो फोटोग्राफी भी कर लेना । तो ठीक हैं आप कह रही हैं तो चलो । और हम सब उनके साथ उनके घर गए ।
चाय पी और उनके परिवार वालों से मिले अच्छा लगा । ये वही फोटो हैं । जब सब फोटोग्राफी के लए निकले थे । यहाँ एक आदमी अकेला बैठ कर ताप रहा था । और दूर खड़े हैं सारे दोस्त बातें करते हुए जा रहे थे । ये फोटो उस जगह की उस वक़्त की आज भी याद दिलाती है !!
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| जहांगीराबाद |
रविवार, 12 मई 2013
ज़िन्दगी ctrl + z तो नहीं हैं ..फिर भी
पीली- नीली लाइट में चमकती उसकी वो उँगलियाँ ...और लैंप लाइट के सामने बैठ कर मुस्कुराते गुनगुनाते डायरी लिखता है , अब बड़ा हो कर सब कुछ समझ मे आ ही गया ..उसके पास ढेरों पुस्तके पड़ी है जिनमें बहुत पहले की यादें समेटे हुई है ..किसी मैं सूखी गुलाब की पंखुड़ी, तो किसी में टहनी, किसी में कार्टून, तो कहीं सबक लिखा है ...उसमे सबसे इम्पोर्टेंट टीचर की साइन, दरसल तब तो वो बच्चा था , बड़ा होने के बाद ये सब देख कर दिल मुस्कुराता तो है ही :) ... घड़ी की सुई टिक -टिक चाँद तारे टिम- टिम ....थोड़ी देर बाद पैगाम आता है हवाओं का , चिराग़ बुझ गया । अँधेरा छा गया , पीछे से नानी अम्मा की आवाज़ आती है ..बेटा सो जाओ ..मैंने एक न सुनी नानी अम्मा के कहने के बाद मै कबीर दास का दोहा गुनगुनाने लगता हूँ अपनी धुन में,,,,,,,
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब .....
पल में परले होइगी बहुरि करेगा कब ............
फिर नानी अम्मा की छड़ी की आहट आती है । पास आकर बोलती है कि तुम्हे सोना नही है । क्या कर रहे हो .. मेरे हाथ की डायरी जल्दी से बंद हो जाती है ..वैसे भी माँ से कुछ छिपा नही है । तो नानी अम्मा से क्या छिपे गा ..फिर भी नानी अम्मा की समझ में सब कुछ आता है .. जबकि मैंने सिर्फ़ अपनी डायरी मै यही लिखा था । "एक खूबसूरत दिन" मै चाहता था । कि ये यादें समेट कर एक लॉकर में बंद कर दू । एक बेपहिये की गाडी की तरह जिसमे हमने बहुत कुछ सीखा गली गलियारों में टहले स्कूल जाते बारिश में भीगना कभी दोस्तों के साथ बायस्किल प्रतियोगिता , और बहुत सी बातें । कि तुम उसे याद न करो सबको समेट कर रख दो ज़िन्दगी ctrl + z तो नहीं हैं कि उसे दबाने के बाद सब कुछ वही का वही हो जाए । सोने से पहले एक सुनहरी सुबह का इंतज़ार होता है , और सुबह उठते ही मैं खिडकियों के पास जरूर जाता था , हर किसान सुबह सुबह गाये भेंशो को चारा दे कर अपने खेत निकल जाता था, चिड़ियाँ दाना लेकर आ जाती थी , दादा जी नमाज पढ़ कर हुक्का भी गुद्गुड़ाने लगते थे ..उधर पंडित जी अपनी लुटिया लेकर उगते सूरज को नमन कर रहे होते है ...हम्म मैंने बहुत कुछ देख लिया , तबतक अखबार वाला आ गया चलो ......दुनिया की खबरें देखते हैं ...क्या फ़रमाते है जनाब ... खबरों से दिल भर जाता है , क्या हो रहा है क्यूँ हो रहा है , इन नेताओ के बीच जनता क्यूँ पिस रही है , फसबूकिया लोग तो फेसबुक पर युद्ध लड़ रहे है , तमाम बातें है तबतक चाये आ जाती हैं ( मुस्कुराते हुए ) हम भारतीय चाये की चुश्की के बगैर रह भी नहीं पाते ।
शनिवार, 20 अप्रैल 2013
वो शाम
चली जा रही है वो अपनी धुनों मे बसों की कतारें ।
जल रही थी वो बत्तियाँ वो बिजलियाँ
चलो घर की अब वो घडी याद आई ।
चलो घर की वो शाम फ़िर लौट आई ।
चलो घर की वो शाम फ़िर लौट आई ।
गुरुवार, 10 जनवरी 2013
उडी पतंग
उडी पतंग
लो जी ....
आ-गई पतंगों की बहार , ये डोर पनप रही । इन छोटे - छोटे हाथों मै थम रही है । ये पतंग हवा मै मचल रही है , दिलों मै उमंगें उभर रही है , इधर-उधर नज़रे तलाशती फिर रही है ।
कि कब ... कटेगी ये पतंग ...
कब मिलेगी ये पतंग ...
ज़रा इन्हें भी अपने रंग मै रंग लेने दो ।कहीं ख़ामोशी बिछी हुई है । लेकिन फिर भी ज़ज्बा वही है ।सबकी पतंगों का रंग अलग अलग है , जब मेरी पतंग उडी ।तो सब पतंगों मै घुल मिल गई ।
रंगों की रंगत मै रंगी ये पतंगे ,सभी को खुश रखती है ।चरखे पर लिपटती डोर और रंग बिरंगी पतंगें इसका तो जवाब ही नहीं , इन पतंगों का खेल भी अजीब होता है । कुछ हवा मै उड़ाते है तो कुछ देख कर मज़ा लेते है ये पतंगें आम लोगो की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गई है ।
मै हमेशा की तरह आज भी उड़ रही हूँ ।मै खुश हूँ, आज़ाद हूँ, किसी के बंधन मै कैद नहीं , और आज भी मै सबके दिलों मै जिंदा हूँ ।मेरी दोस्ती सभी से है ।लेकिन खास कर बच्चे मुझे ज्यादा पसंद करते है।
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