गुरुवार, 23 जनवरी 2014

हाँ मै एक कलम कार हूँ


हाँ मै एक कलम कार हूँ ...

देश के हर नागरिक की तरह में भी एक कलमकार हूँ , कभी मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी तो कभी कबीरदास के दोहों पर मंडराती थी, पहले बच्चे मेरे साथ साथ खेलते हैं । फिर युवा अपनी किस्मत आजमाते हैं ,कभी भगत सिंह तो कभी महात्मा गाँधी के इतिहासों को रचती थी । कभी खतों के पन्ने पलती हूँ किसी के मंजिल का रास्ता, तो किसी के घर का वास्ता, वोह कलम जहाँ हजारों - लाखो लोगो की रोजी - रोटी बनती हूँ ,देश के हर नागरिक का रास्ता मेरे पास से ही गुज़र कर जाता हैं, मै सबके हाथों में होती हूँ । मुझसे कोई सच लिखवाता हैं तो कोई झूठ, कभी शब्द को नाप तोल कर लिखा जाता हैं | कभी लोग मुझे बेच भी देते हैं | दौतल और शौहरत के लालच में, लेकिन मुझे जरूरत होती हैं एक सच्चे नागरिक कि, जो हर नागरिक के साथ हो रहे जुल्म का सवाल उठा सके |
हाँ मै एक कलमकार हूँ ...उन कोरे कागजों को भरने वाली किताबों को रंगने वाली ,
हाँ मै एक कलम कार हूँ । देश के हर नागरिक की तरह मै भी कलम कार हूँ ।

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