चाय का प्याला हो या प्याली चाय पीने का मज़ा तो कुल्हड़ में ही हैं। जब दिगती हुई भट्टी से चाय की केतली उतरती, तब उस कुल्हड़ में चाय डालने के बाद चाय सौंधी सौंधी खुश्बू के साथ जायके दार हो जाती थी, ये कुल्हड़ बनाने वाला भी बहुत हुनर मंद था, अलग अलग डिज़ाइन में तैयार करते हर तरह के बर्तन, और एक तरह से कुम्हार को अंदाज़ा भी होता था, कि मिटटी के बर्तन बनाने के लिए मिट्ठी कैसी होनी चाहिए,तभी इतने खूबसूरत कुल्हड़ उनकी चाक से उतरते थे। ज्यादातर तो कुल्हड़ की ही मांग होती थी। चाक से उतारते ही उनके कुल्हड़ बिक जाते थे, वो रात को मिटटी के बर्तन पकाने के बाद सुबह या दोपहर तक चाय की कितली पर पंहुचा देते थे। जिससे उनकी रोजी रोटी का आसरा मिल जाता था। धीरे धीरे इनकी तलाश कम होती जा रही हैं। शायद कहीं इक्का - दुक्का जगह दिख जाए नही तो अब लोग प्लास्टिक ग्लास में चाय पीने लगे हैं। जिससे कुल्हड़ का चलन ख़त्म हो रहा हैं। वह ग्लास जो बच्चो के खिलौने जैसे दिखते हैं। और वह प्लास्टिक ग्लास वाली चाय कहीं ५- तो कहीं १० रूपये की मिल पाती हैं जिसमें दो घूँट चाय जैसे उबलता पानी,न जायका न पत्ती वैसे देखा जाए तो चाय दुनिया भर में अलग अलग तरीके से बना के पीते हैं कॉफी मसाला चाय हरी चाय नींबू या आड़ू की चाय, कुछ इस तरह चाय लोगो का मन लुभा रही हैं,लेकिन सच तो यह है, कि कुल्हड़ वाली चाय से भारत कि पहचान को दर्शाता हैं ।
बुधवार, 29 जनवरी 2014
गुरुवार, 23 जनवरी 2014
तू भी एक इंसान बन
तू यूँ ही ना सवाल करना किसी कि ज़िन्दगी पे वार कर
तू एक इंसान बन तू एक इंसान बन
बना सके तो एक अच्छा जहाँ बना
जहाँ हो बस एकता जहाँ खूबसूरत ख्वाब् हो हर किसी के खवाब हो
खिले भी फूल भी वहाँ जहाँ न हो रंग भेद भाव का न हो भेद जाति- पाति का
जहाँ खिले फूल हर रंग के वोह बाग़ भी खुशी के संग झूमती रहे
न बाँध उन ज़ालिमो की ज़ंजीरों से हमारे इन बुलंद सपनो को न कर किसी के सपनो कि हत्या न कुचले जाए किसी के घर न किसी माँ कि सुनी हो गोदन मंच पर ग़लत सवाल कर न लोगो को गुमराह करबहुत हुआ बहुत हुआ ?उठे हाथ इन्साफ के लिए चले क़लम इन्साफ के लिएएक खूबसूरत जहाँ हम बनाएंगेजहाँ हर किसी को इन्साफ मिलेजहाँ क़तार बे क़तार हो न मंदिर - मस्ज़िद का सवाल हो न चर्च का सवाल होमहफिलों में भी जहाँ सवालिया मिज़ाज़ हो !लफ्ज़ को सहेज कर किताब को हसीं कर
न तू खुदगर्ज़ बन न तू हैवान बन
तू भी एक इंसान बन तू भी एक इंसान बन
हाँ मै एक कलम कार हूँ
देश के हर नागरिक की तरह में भी एक कलमकार हूँ , कभी मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी तो कभी कबीरदास के दोहों पर मंडराती थी, पहले बच्चे मेरे साथ साथ खेलते हैं । फिर युवा अपनी किस्मत आजमाते हैं ,कभी भगत सिंह तो कभी महात्मा गाँधी के इतिहासों को रचती थी । कभी खतों के पन्ने पलती हूँ किसी के मंजिल का रास्ता, तो किसी के घर का वास्ता, वोह कलम जहाँ हजारों - लाखो लोगो की रोजी - रोटी बनती हूँ ,देश के हर नागरिक का रास्ता मेरे पास से ही गुज़र कर जाता हैं, मै सबके हाथों में होती हूँ । मुझसे कोई सच लिखवाता हैं तो कोई झूठ, कभी शब्द को नाप तोल कर लिखा जाता हैं | कभी लोग मुझे बेच भी देते हैं | दौतल और शौहरत के लालच में, लेकिन मुझे जरूरत होती हैं एक सच्चे नागरिक कि, जो हर नागरिक के साथ हो रहे जुल्म का सवाल उठा सके |
हाँ मै एक कलमकार हूँ ...उन कोरे कागजों को भरने वाली किताबों को रंगने वाली ,
हाँ मै एक कलम कार हूँ । देश के हर नागरिक की तरह मै भी कलम कार हूँ ।
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