गुरुवार, 27 नवंबर 2014

मैं एक आवारा पंछी

 मैं  एक आवारा  पंछी
जाने कहाँ कहाँ फिरूँ में
दूर दराज़ से आया पंछी
सारे जग का प्यारा पंछी
हवा के झोंको संग पंख लहराता
में ना आंधी तूफ़ान से डरता
घने बादलों के नीचे में मंडराता
ना मेरा दो गज जमीन का नाता
ना मेरा कोई धर्म  का वास्ता
 मैं  एक आवारा  पंछी
जाने कहाँ कहाँ फिरूँ में
जाने कितने रंग हमारे जाने कितने नस्ल  हमारे
साँझ में अपना बसेरा बसाते, सुबह कुक्ङुक्कू  हमें जागते
कोयल हमें आमों की दावत देती, मिट्ठू मियां सारे आम झूठे कर जाते
और निकल पड़ते अपने बाज़रे की तलाश में
किसान चाचा  बैठे हार में  मचान डाले
जब देखा पंछियों का झुण्ड
बड़ी ज़ोऱ से  शोर मचाते अजीबों तरह आवाज़ निकालते
डर  के भागे शोर मचाते फिर भी हम उनको आँख दिखाते भूखे पेट हमें भगाते
चुन चुन हम अपने बच्चों को देते, दाने दाने के लिए जाने कितने मीलों दौड़ते
हरी पत्तियों के बीच  चूं चूं  करते बच्चों ने देखा  जग का नया सवेरा
उड़  चले हम सब  आवारा  पंछी
दूर दराज़ से आये पंछी





अरमा अंसारी






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