सोमवार, 6 जुलाई 2020

रंगीन दीवारों का पता

वह घर कच्ची मिटटी से बना हुआ और घर की दीवारें रंगीन चुने से पुता हुआ ईद की ख़ुशी में और रंगीन चमकता हुआ घर, इस घर में डाकिए महीने भर में ख़त लाते  रहते लेकिन हर दफ़ा गली के गलियारे भूल जाते हैं,जो भी डाकिया आता है गांव के उस नुक्कड़ पर पर रखीं पान वाली गुमटी के पास  सायकिल रोक कर पता पूछता  है, डाकिया गांव के अंदर जाता हुआ घर का पता ढूंढता हुआ बड़बड़ता हुआ, सायकिल टूटी फूटी सड़को पर खडबड़ करती हुई मचलती हुई रास्ता पूछती हुई सबका ध्यान अपने खतों की तरफ खींचती हुई उस रंगीन दीवारों वाले घर तक पहुंचना चाहती थी  गावों के लोग भी  इसी नाम से जानते थे रंगीन आसमानी कलर का घर जो  चुने से पता हुआ है किस तरह के दरवाज़े होंगे खिड़किया कैसे होंगी घर के सामने पेड़ लगा होगा सब यही पता बता रहे थे, एकदम सीधा चले जाईये जनाब दांयें बाएं मत मुड़ियेगा नहीं तो भटक जाएंगे 
डाकियाँ पसीना पोछता हुआ फिर से सायकिल के हैंडल पर रखा हाथ, और हाथ में ख़त, ख़त में पता जिसका कोई नहीं अता - पता 
- अरमा नफीसा अंसारी 



सोमवार, 6 अप्रैल 2020

मूंगफली वाला

सर्दियों की रात में अक्सर  शाम होते सन्नाटा पसरने लग जाता है, ठण्ड की वजह से लोग जल्दी सो जाते है, या कुछ काम कार रहें होते है, इन्ही सन्नाटों के बीच घनघोर कोहरा, आसमान के नीचे धुंधली चादर सा दिखाई दे रहा था और काली रात में  चार मंज़िलों पर रौशनी भी कोहरे के वजह से  धुंधली सी थी  बालकनी पर टंगे परदे ठण्डी हवा से टकरा कर आवारों की तरह झूम रहें थे पास में लगे पेड़ों की टहनियां भी कोहरे से भीगी हुई शरमाई शरमाई सी झूम रही थी, लैंप की रंगीन बत्ती को बरामदे के टंगे परदे उन्हें बार बार छुपा रहे थे, गली के कुत्ते दीवारों के बल उठते बैठते अपनी जगह तलाश रहे थे दूसरे छोर  पर मूंगफली वाला मूंगफली बेच रहा था, सायकिल पर मूंगफली की बोरी बांधे और  हैंडल पर तराज़ू  लटकाये चिल्लाते हुए आगे बढ़ रहा था मूंगफली के शौकीन  निकल कर मूंगफली भी खरीद रहें थे।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

राग

रात अंधेरी  खिड़की में कोई राग-आल्हा जपता है 
कहीं गहरा समन्दर झूमता है 
कहीं राधा का पनघट सूखता है 
ये इमारतें आसमा चूमती है 
किसी कागज़ पर नस्लों की विरासत छपती है 
लोबान की धूनी का धुवाँ उड़ाता 
कोई फ़कीर खुदा की दुहाई देता है 
कोई बहार जंगल की कोख में पलती है 
किसी माली का पेट भरती है 
उसकी चमक मंदिर मस्जिद गीरजाघर में फूलों के चमन से होती 
कोई राग यही बातलाता है ना वक़्त लौट कर आता है 

बुधवार, 25 मार्च 2020

अहम

कहानियां कागज़ को रंगीन करती हैं 
दिल को गुदगुदाती हैं 
लबों पे मुस्कुराती हैं 
गावों की कहानियां दिलों पर राज करती हैं
ओर दादी अम्मा की बातें रात चढ़ते ही ख्वाबों की तरह परियों के संग टहलाती हैं 

मंगलवार, 24 मार्च 2020

महार की कश्ती

महार की 'कश्ती' को यू समझिये एक बेटा पल रहा हो कोई पैर ना मारे कहीं से उसको एक खरोच ना आये चीजों की एहमियत तो उन्ही लोगो को पता होती हैं जिससे किसी  गरीब की रोजी रोटी चलती हो 
महार भी उन्ही में  से एक था. महार का एक अपना  बेटा था जो कि महार निकम्मा- निकम्मा  कह कर ड़ांटता रहता  था. वैसे उसको  पाड़े कह कर बुलाते थे क्या है ना  की गरीबों  को नाम रखने के लिए कोई कुंडली नही निकलवाते जैसे ही पैदा हुये जो मन में आया वोह कह कर बुलाने लगते  थे, सो  हो गया पाड़े, पाड़े हर वक़्त ढ़ीली पैंट को चढ़ाता रहता और बहती नाक को मैली मैली अस्तीनों के हवाले करता रहता छोटा था  लेकिन जैसे- तैसे महार के साथ हाथ बटाता था महार सुबह पांच  बजे उठते ही अपने जानवरों को  आहाते से लाकर बाहर बांध देता ओर फिर अपने सर पर गमछा लपेट कर अपने सपनों की कश्ती को सर पर रख कर चल देता महार की कश्ती को वोही ठहरना था जहां पानी का बहाव था सिंघाढ़ों की फसल जम रही थी तालाब में हरे पत्तों ने पानी को ढ़क रखा था 
नुकसान भी काफी झेलता था क्यूँकी सिंघाढ़ों की चोरी भी हो जाती  जिसकी वजह से सुबह तडके उठ कर बिना कुछ खाये पिये सीधे तालाब पर ही जाता था 
फिर दोपहर होने से पहले नंगे पावं फटी ऐडीयां हाफते हुये महार अपने भुखे पेट का इन्तिजांम  करके लौट रहा होता हैं ओर पीछे-पीछे पाड़े इतनी तेज तर्रार चाल तो नही लेकिन अपने पिता के साथ खेलते कूदते सारी फिक्रों  से बेपरवाह हो कर चल रहा होता था 
महार घर पहुचते ही कश्ती को सर से ऊतार कर रखता है, महार के परिवार के अलावा ओर भी जानवर रहते हैं एक बिल्ली जिसका नाम लल्ली रखा हैं ओर एक कुत्ता जिसका नाम गबरु था गबरु शरारती था लाख डांटने पर नहीं मानता ओर पूस के बल खड़ी सायकिल पर सू सू कर देता, यही देख कर महार तंग हो जाता था ओर फिर गबरु को बैठ कर समझाता गबरु आँखों को दब दबाता इधर उधर देख कर अपने पैरों  पर सर रख लेता महार बड़बडाते  हुये उठ कर कहता कितना काम पड़ा है सिंघाढ़ों का ढेला भी  बाज़ार ले कर जाना है खाना भी नही खाया ये कहते हुये गर्म अलाव के पास बैठ कर अधजले भूने आलू निकालते  हुये अपनी पत्नी को बुलाते हुये कहता है अरे चटनी-वटनी पिसी है क्या? देर हो रही है, दूर से आवाज़ आती है बिना चटनी के आलू खा लो मावेशियों को चारा देना है अब महार पाड़े को आवाज़ लगाता अरे कहाँ मर गया खेलना बंद कर खेलने के पैसे नही मिलेंगे जो है खा ले जल्दी बाज़ार शुरू होने वाली है सिंघाढ़ों का ढ़ेला लेकर जाना है देर हो गई तो सिंघाढ़े का एक ढेला भी नही खिसकने वाला पाड़े के बैठते ही लल्ली अपने पंजों के बल पाड़े के साथ ऊछल- कूद करते- करते बाहर आ जाती है 
महार का घर पूस से बना है खाना भी मुश्किल से ही मिल पाता है लेकिन दिल इतना बड़ा है कि जानवरों को पाल रखा है अब पाड़े ढ़ेला निकालता है झाड़ते हुये आवाज़ लगाता है पप्पा  सिंघाढ़ा का डालिया ले कर आ जाओ गाडी तैयार है, तब तक अम्मा बाहर निकल कर आती है ओर बोलती हैं पाड़े के पप्पा जल्दी आ जाना मावेशियों का चारा खत्म हो गया है, महार कहता हुआ ये चलता बनता है सिंघाढ़ा बिक जाए गा तभी आ पायेंगें हफते में एक बार बाज़ार लगता है, नही बिके तो अगली बाज़ार तक ये सिंघाढ़े खराब हो जायेंगे 
बाज़ार पहूँचते ही ढेला अपनी जगह पर लगा कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हैं आ जाओ दस  का पाव दस का पाव बाज़ार में सिंघाढ़ों का दाम था दस रूपये के पाव ओर भी महार थे बाज़ार में जो ठीक-ठाक ओर थोड़ा पैसों में अच्छे थे तोह वो थोड़ा अच्छा इन्तेज़ाम किये हुये थे सिंघाढ़ों को ऊबाल कर उनकी गुदिया निकाल कर कागज़ का कोन बना कर हरी चटनी के साथ पच्चीस रूपिये पाव देते थे 
लेकिन महार ये सब देख ठंडी सांस लेता हैं क्यूँकी महार के पास इन सारे इंतज़ाम के लिए पैसे नही हैं बड़ी मुश्किल से उसके घर का खर्च निकल पाता हैं 
शाम ढल कर रही लालटैन की रोशनियां  बढ़ रही है 
रात होने से पहले महार को घर भी लौटना है ठंड भी बढ़ रही है थोडे से सिंघाढ़े बचे थे लेकिन भरी बाज़ार में पाड़े की बुलंद आवाज़ धीमी नही हुई उसकी आवाज़ लाल टैन कि लौ कि तरह बढती रही जब तक सिंघाढ़े नही बिके थे
अँधेरा होते-होते पांड़े के सिंघाड़े ख़त्म  हो चुके थे!  
अन्धेरा बढा ओर तब तक पाड़े और  महार अपना सामान समेट कर रखा ओर महार ने अपनी जेब से एक रूपिया निकाल कर पाड़े के हाथ पर रखता है ओर पाड़े ख़ुशी से ऊछल कर उठता है ओर लालटैन को ऊठाता है ओर छोटे छोटे पॉव से सपनों को नापता हुआ  महार के ढेले के साथ चल देता है 


अरमा नफीसा अंसारी 

पुराना मकान


वोह घर पतली गालियों में पुरानी ईमारतों में छूपा !
सूखी टेहनियों की छाँव से ढ़का !
कहीं-कहीं टूटी ईटें झांक रही हैं !
कहीं डांसर की तरह लम्बी लकडियां गिरती दिवारों को साधे खड़ी हैं !
कोने में धूल सिमटी हुई है !
खिड़कियां मकड़ी के जाल से बुनी हुई है !
आंगन की दीवारों पर पेडों का घराना बस रहा है !
सादियों से लगे सदर दरवाज़े की लकडियां खुशक हो रही हैं 
जो कुछ बचे है वोह संदूक और डालिया में सपने
सूईं धागे वाली डालिया में खतों के सिलसिले रुके पडे हैं 
नानी- दादी के किस्से संजोये हुये हैं ! 
कुछ पुराने ख़तों को दीमक खा गए हैं ! 
जैसे सूईं में रेशम के धागे पिरोये हुयें हैं !
बिना बटन के खादी की सीदरी जाने कब से संदूक में रखी हुई है  जिसमे काज बनना बाकी हैं 
कह दो उन टूटी दीवारों से मेरा इंतिजार ना करें आऊँ गी कभी फुरसत से बहुत सी बातों को समेटने 
8 नवम्बर  2018

अरमा नफीसा अंसारी