मंगलवार, 24 मार्च 2020

महार की कश्ती

महार की 'कश्ती' को यू समझिये एक बेटा पल रहा हो कोई पैर ना मारे कहीं से उसको एक खरोच ना आये चीजों की एहमियत तो उन्ही लोगो को पता होती हैं जिससे किसी  गरीब की रोजी रोटी चलती हो 
महार भी उन्ही में  से एक था. महार का एक अपना  बेटा था जो कि महार निकम्मा- निकम्मा  कह कर ड़ांटता रहता  था. वैसे उसको  पाड़े कह कर बुलाते थे क्या है ना  की गरीबों  को नाम रखने के लिए कोई कुंडली नही निकलवाते जैसे ही पैदा हुये जो मन में आया वोह कह कर बुलाने लगते  थे, सो  हो गया पाड़े, पाड़े हर वक़्त ढ़ीली पैंट को चढ़ाता रहता और बहती नाक को मैली मैली अस्तीनों के हवाले करता रहता छोटा था  लेकिन जैसे- तैसे महार के साथ हाथ बटाता था महार सुबह पांच  बजे उठते ही अपने जानवरों को  आहाते से लाकर बाहर बांध देता ओर फिर अपने सर पर गमछा लपेट कर अपने सपनों की कश्ती को सर पर रख कर चल देता महार की कश्ती को वोही ठहरना था जहां पानी का बहाव था सिंघाढ़ों की फसल जम रही थी तालाब में हरे पत्तों ने पानी को ढ़क रखा था 
नुकसान भी काफी झेलता था क्यूँकी सिंघाढ़ों की चोरी भी हो जाती  जिसकी वजह से सुबह तडके उठ कर बिना कुछ खाये पिये सीधे तालाब पर ही जाता था 
फिर दोपहर होने से पहले नंगे पावं फटी ऐडीयां हाफते हुये महार अपने भुखे पेट का इन्तिजांम  करके लौट रहा होता हैं ओर पीछे-पीछे पाड़े इतनी तेज तर्रार चाल तो नही लेकिन अपने पिता के साथ खेलते कूदते सारी फिक्रों  से बेपरवाह हो कर चल रहा होता था 
महार घर पहुचते ही कश्ती को सर से ऊतार कर रखता है, महार के परिवार के अलावा ओर भी जानवर रहते हैं एक बिल्ली जिसका नाम लल्ली रखा हैं ओर एक कुत्ता जिसका नाम गबरु था गबरु शरारती था लाख डांटने पर नहीं मानता ओर पूस के बल खड़ी सायकिल पर सू सू कर देता, यही देख कर महार तंग हो जाता था ओर फिर गबरु को बैठ कर समझाता गबरु आँखों को दब दबाता इधर उधर देख कर अपने पैरों  पर सर रख लेता महार बड़बडाते  हुये उठ कर कहता कितना काम पड़ा है सिंघाढ़ों का ढेला भी  बाज़ार ले कर जाना है खाना भी नही खाया ये कहते हुये गर्म अलाव के पास बैठ कर अधजले भूने आलू निकालते  हुये अपनी पत्नी को बुलाते हुये कहता है अरे चटनी-वटनी पिसी है क्या? देर हो रही है, दूर से आवाज़ आती है बिना चटनी के आलू खा लो मावेशियों को चारा देना है अब महार पाड़े को आवाज़ लगाता अरे कहाँ मर गया खेलना बंद कर खेलने के पैसे नही मिलेंगे जो है खा ले जल्दी बाज़ार शुरू होने वाली है सिंघाढ़ों का ढ़ेला लेकर जाना है देर हो गई तो सिंघाढ़े का एक ढेला भी नही खिसकने वाला पाड़े के बैठते ही लल्ली अपने पंजों के बल पाड़े के साथ ऊछल- कूद करते- करते बाहर आ जाती है 
महार का घर पूस से बना है खाना भी मुश्किल से ही मिल पाता है लेकिन दिल इतना बड़ा है कि जानवरों को पाल रखा है अब पाड़े ढ़ेला निकालता है झाड़ते हुये आवाज़ लगाता है पप्पा  सिंघाढ़ा का डालिया ले कर आ जाओ गाडी तैयार है, तब तक अम्मा बाहर निकल कर आती है ओर बोलती हैं पाड़े के पप्पा जल्दी आ जाना मावेशियों का चारा खत्म हो गया है, महार कहता हुआ ये चलता बनता है सिंघाढ़ा बिक जाए गा तभी आ पायेंगें हफते में एक बार बाज़ार लगता है, नही बिके तो अगली बाज़ार तक ये सिंघाढ़े खराब हो जायेंगे 
बाज़ार पहूँचते ही ढेला अपनी जगह पर लगा कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हैं आ जाओ दस  का पाव दस का पाव बाज़ार में सिंघाढ़ों का दाम था दस रूपये के पाव ओर भी महार थे बाज़ार में जो ठीक-ठाक ओर थोड़ा पैसों में अच्छे थे तोह वो थोड़ा अच्छा इन्तेज़ाम किये हुये थे सिंघाढ़ों को ऊबाल कर उनकी गुदिया निकाल कर कागज़ का कोन बना कर हरी चटनी के साथ पच्चीस रूपिये पाव देते थे 
लेकिन महार ये सब देख ठंडी सांस लेता हैं क्यूँकी महार के पास इन सारे इंतज़ाम के लिए पैसे नही हैं बड़ी मुश्किल से उसके घर का खर्च निकल पाता हैं 
शाम ढल कर रही लालटैन की रोशनियां  बढ़ रही है 
रात होने से पहले महार को घर भी लौटना है ठंड भी बढ़ रही है थोडे से सिंघाढ़े बचे थे लेकिन भरी बाज़ार में पाड़े की बुलंद आवाज़ धीमी नही हुई उसकी आवाज़ लाल टैन कि लौ कि तरह बढती रही जब तक सिंघाढ़े नही बिके थे
अँधेरा होते-होते पांड़े के सिंघाड़े ख़त्म  हो चुके थे!  
अन्धेरा बढा ओर तब तक पाड़े और  महार अपना सामान समेट कर रखा ओर महार ने अपनी जेब से एक रूपिया निकाल कर पाड़े के हाथ पर रखता है ओर पाड़े ख़ुशी से ऊछल कर उठता है ओर लालटैन को ऊठाता है ओर छोटे छोटे पॉव से सपनों को नापता हुआ  महार के ढेले के साथ चल देता है 


अरमा नफीसा अंसारी 

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