मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

Translation: मानव क़्या अधिकार

मानव  क़्या  अधिकार है ?
मानव अधिकार …… यह एक अच्छा सवाल है ?
मानव अधिकार   …इसे परिभाषित करना एक कठिन काम  है ?
मुझे इस पर थोड़ा काम  करना पडेगा
वह अधिकार जो इंसानो के लिए है 
यह एक बहुत बड़े वाद विवाद का  मुद्दा है
 मानव अधिकारों के कई मतलब हो सकते है
अगर आप बीस लोगो से पूछें  गे , तो बीस लोगो के अलग अलग विचार सुनने को मिलेंगे
मुझे नही.... पता यह काफी जटिल सवाल है
यह थोड़ा मुश्किल  है ?
मुझे लगता है हम इसका मूल्य नही  पहचानते ?
हम इसके बारे में विचार भी नहीं करते ?
ह्यूमन -  मानव होमो सेपियन प्रजाति के सदस्य, महिलाएं , बच्चे और व्यक्ति
राइट्स - अधिकार वह चीजे जिसके हम हक़दार है
एवं ऐसी स्वातंता जो निश्चित है ?
ह्यूमन राइट्स 
 मानव अधिकार : वह अधिकार जो आपको इंसान होने के नाते प्राप्त है।
मानव अधिकार वह है , जिसकी आप उम्मीद एक इंसान के रूप करते है।
- आज़ादी से जीने का अधिकार।
अपने मन की बात कहने का अधिकार।
समानता का अधिकार।
वैसे तो विभिन्न प्रकार के अधिकार है।
लेकिन  कुछ अधिकार   कुछ समूहों के लिए ही लागू है। लेकिन मानव अधिकार हर समूहों पर लागू होते है।
इसका मतलब बच्चों पर वृद्धों के लिए खिलाडी , सफाई, कर्मचारी, रैपर्स, अधयापक, अफ़्रीकी, भारतीय, अल्बेनियन, ईसाई, मुस्लिम , नास्तिक आपके माता पिता आपके पडोसी और आप सब  सामान अधिकार है।
अन्य शब्दों में सार्वभौमिक है।
लेकिन  प्रशन यही है , कि  आखिर मानव अधिकार यही है।
जीने का अधिकार
 हर एक का जन्म समानता व स्वतन्त्रता  है
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
 सयुंक्त रास्त्र  कुल तीस
१ - हम सभी स्वतंत्र और सामान है
२ - भेदभाव न करना।
 ३- जीवन का अधिकार।
४- ना गुलामी
५- ना यातना
६ - आपके पास अधिकार है। आप कहीं भी रहे।
 ७-कानून की दृष्टि से सब सामान है।
८- कानून आपके मानव अधिकारों की रक्षा करता है।
९- अनुचित गिरफ़्तारी नही
१०-  परीछन   का अधिकार
११ - दोषी साबित होने तक हम निर्दोष  है।
12 -  एकांत का अधिकार।
१३ - भ्रमण  का अधिकार
१४ - जीने के लिए एक सुरक्षित जगह तलाश करने का अधिकार
१५-  राष्ट्रीयता का  अधिकार
१६ - शादी एवं परिवार
१७ - अपनी वस्तुओं का अधिकार
१८- विचारों की स्वतंत्रता
१९- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
२० - सार्वजनिक सभा करने का अधिकार
 २१ - लोकतंत्र का अधिकार
२२ - सामाजिक सुरक्षा
२३ - श्रमिको के अधिकार
२४ - खेलने का अधिकार
२५ - सभी के लिए भोजन और आश्रय
२६ - शिक्षा का अधिकार
२७ - निष्पक्ष्  और मुक्त दुनिया
२८ - उत्तर्दयित्व
२९ - कोई आपके मानव अधिकार  नही ले सकता।
यह सब मानव अधिकार  सार्वभौमिक घोषणा में सूचीबद्ध है।
यह सबसे व्यापक रूप से स्वीकार किया गया दस्तावेज है
लेकिन एक छोटी सी समस्या है।
सभी के पास भोजन एवं आश्रय का अधिकार है।
फिर भी रोज १६ हज़ार बच्चे भूक से मर रहे है।
यर्थाथ प्रत्येक पांच सेकेण्ड मैं एक बच्चा अगर सभी के पास शिक्षा का अधिकार है
फिर क्यों  ....
एक अरब वयस्क पढ़ भी नही सकते अगर गुलामी को समाप्त कर दिया गया है।  फिर भी क्यों
सत्ताईस मिलियन लोग आज भी गुलाम है।
मानव अधिकारों की सार्व भौमिक घोषणा  को कानून बल प्राप्त नही है। जिन सदस्य राष्ट्रों ने हस्ताक्षर  किये है
यह शब्दों से अधिक है।  लेकिन सवाल यह है , कौन इन शब्दों को वास्तविकता  बनाएगा।
मानव अधिकारों  को एक वास्तविक ता  बनाना है।  








गुरुवार, 27 नवंबर 2014

मैं एक आवारा पंछी

 मैं  एक आवारा  पंछी
जाने कहाँ कहाँ फिरूँ में
दूर दराज़ से आया पंछी
सारे जग का प्यारा पंछी
हवा के झोंको संग पंख लहराता
में ना आंधी तूफ़ान से डरता
घने बादलों के नीचे में मंडराता
ना मेरा दो गज जमीन का नाता
ना मेरा कोई धर्म  का वास्ता
 मैं  एक आवारा  पंछी
जाने कहाँ कहाँ फिरूँ में
जाने कितने रंग हमारे जाने कितने नस्ल  हमारे
साँझ में अपना बसेरा बसाते, सुबह कुक्ङुक्कू  हमें जागते
कोयल हमें आमों की दावत देती, मिट्ठू मियां सारे आम झूठे कर जाते
और निकल पड़ते अपने बाज़रे की तलाश में
किसान चाचा  बैठे हार में  मचान डाले
जब देखा पंछियों का झुण्ड
बड़ी ज़ोऱ से  शोर मचाते अजीबों तरह आवाज़ निकालते
डर  के भागे शोर मचाते फिर भी हम उनको आँख दिखाते भूखे पेट हमें भगाते
चुन चुन हम अपने बच्चों को देते, दाने दाने के लिए जाने कितने मीलों दौड़ते
हरी पत्तियों के बीच  चूं चूं  करते बच्चों ने देखा  जग का नया सवेरा
उड़  चले हम सब  आवारा  पंछी
दूर दराज़ से आये पंछी





अरमा अंसारी






शनिवार, 8 नवंबर 2014

बस्ती

 बस्ती की वो पुरानी तंग  गालिया वही पुरानी परंपरा किसी के किवाड़ के सामने बकरी मिम्मना रही हैं एक दरजी खटखटखट  मशीन चला रहा हैं , दो कुत्ते कसाई की दुकान के सामने खड़े हो कर एक गोश्त के टुकड़े के लिए त्योरी चढ़ा-चढ़ा कर  आपस में लड़ रहे हैं, अबे तूने बेईमानी क्यों की खेल खेल में  बच्चों के बीच तू तू मैं मैं चल रही हैं, बूढी औरत दरवाज़े की देहरी पर बैठी हैं, रास्ते में आते जाते लोगो को घूर घूर कर देख रही हैं ,  दूसरी मंज़िला से एक साहिबा सब्जी वाले को डोरी में बांध कर सब्जी की टोकरी दे रही हैं, सब्जी वाला ज़ोर ज़ोर से  चिल्ला रहा हैं , आलू  चालीस रूपये किलो पालक तीस रूपये किलो, नीचे लड़का  पानी की छींटे दे दे कर गाड़ी  की सफाई कर रहा हैं    

सोमवार, 5 मई 2014

सुना हैं,आजकल उन घरों कि खिड़किया बन्द रहती हैं।

सुना हैं,आजकल उन  घरों  कि खिड़किया बन्द रहती हैं। 
जिस घर के पास वाली गली से हम अक्सर गुज़रा करते थे।  
घर में बहारों का आना बन्द हो गया, वरना थोड़े बहुत पतझड़ सलाम करने जाते थे 
देखे हैं, रोशनदान घरों में, जहां से आती हैं, चाँदनी रात की रौशनी छन - छन  कर 
जब मैं बरामदे में आता हूँ , ऐसा लगता कोई मेरा इन्तिज़ार कर रहा हैं   
सिर उठा कर देखता हूँ। तो रात की  चांदनी मुस्कुरा रही थी।
 तो मैं भी मुस्कुराया शायराना अंदाज में,
 लेकिन मैं शराब के नशे में, फ़िर भी चूर - चूर था
इस चाँद के मुखड़े को नही देखता अगर, तो  ज़ुबान पे शायरी  यूँ ही न आती,   
और न ही मेरी डायरी में कैद होती, इनकी बातैं 
ज़िन्दगी से थका हारा शराब की लत में मस्त हो जाता 
तुम हमेशा खामोश रहती हो।  उस काली अन्धेरी रात में,
हवाएं आती हैं बस छू कर चली जाती हैं।  कभी उन्हें बैठने कि फुर्शत कहाँ 
 दूर से देखता हूँ तो एक टुकडा सा लगता हैं, ये चाँद 
 लेकिन ये चाँद और चाँद की रौशनी  मेरे लिये बहुत एहमियत रखती हैं।
 वरना ये तन्हाई कहाँ पीछा छोड़ती !!

मंगलवार, 25 मार्च 2014

अलंग शिपयार्ड

ये बात २०१२ की थी जब हम भावनगर से अलंग गए थे पहली बार देखा:
 गुजरात में भावनगर से लगभग 50 किमी  दूर अलंग शिपयार्ड में जहाज तोड़ने का काम कर रहे वो मजदूर  दबी कुचली ज़िंदगी जीते हैं। अलंग शिप में आपको बस बड़े-बड़े जहाज या उनका मलबा ही नजर आएगा। हर तरफ लोहे और लकड़ियों का बहुत सारा कबाड़ बड़ी बड़ी मशीने, और जहाजों से निकलने वाला फर्नीचर व  सामान का बड़ा सा बाज़ार लगा था | 
उन जहाजो को देख कर आप  अंदाज़ा नही लगा सकते कि ये वही जहाज़ जो समुद्र का सीना चीर कर बड़ी तेज रफ़्तार से निकलता हैं, और उन मज़दूरों का शरीर देखिये जो जहाज को तोड़ते तोड़ते उनका शरीर जर्जेर हो रहा हैं । उन  जहाजों में  खतरनाक कैमिकल मौजूद होता हैं , जिनसे जहाजो में काम कर रहे मजदूर को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती हैं  काफी नुकसान पहुचता हैं| जहाज के बड़े बड़े औज़ारों से उनके शरीर का कोई भी अंग जब कट जाता हैं तो मालिक उनके दुःख में उनकी मदद के लिए नही आता । बल्कि  मालिक उन्हें धमकी देता हैं कि अगर आप काम पर नही आये तो आप का मेहनताना काट लिया जाएगा !
 कहना बहुत मुशकिल हैं कि ये क्यूँ हो रहा हैं मज़दूरों के साथ, और जो हो रहा हैं तो क्या वो रुकेगा, बहुत सारी दिक्कतें हैं उनसे पूछने के बाद वो यही था कि उनके पास रोज़गार नही हैं घर नही हैं ! इसके अलावा और कोई रोज़गार नही हैं !उनकी रोज़ी रोटी का सवाल हैं  
 गुजरात चमचमाती सड़कों और ऊंची-ऊंची इमारतों बिजली पानी कि तारीफ़ करते  नरेंद्र मोदी देश के हर कोने में कहते हुए नज़र आते हैं लेकिन ऐसा कुछ नही हैं ! ज़रा अलंग शिप  में भी पूछिए उन मज़दूरों से कि विकास  किसका नाम हैं  किसी बन्दे का या किसी उड़ती हुई चिड़िया का या किसी वास्तु का उन्हें नही पता विकास क्या हैं वाइब्रेंट गुजरात क्या हैं वो सिर्फ मौत के मोड़ पर खड़े हैं उन्हें कोई उम्मीद नज़र नही आती !!   

बुधवार, 29 जनवरी 2014

कुल्हड़ वाली चाय

चाय का प्याला हो या प्याली चाय पीने का मज़ा तो कुल्हड़ में ही हैं।  जब दिगती हुई भट्टी से चाय की केतली उतरती, तब उस कुल्हड़ में चाय डालने के बाद चाय सौंधी सौंधी खुश्बू के साथ  जायके दार हो जाती थी, ये कुल्हड़ बनाने वाला भी बहुत हुनर मंद था, अलग अलग डिज़ाइन में तैयार करते हर तरह के बर्तन,  और एक तरह से कुम्हार को अंदाज़ा भी  होता था, कि मिटटी के बर्तन बनाने के लिए मिट्ठी कैसी होनी चाहिए,तभी इतने खूबसूरत कुल्हड़ उनकी चाक से उतरते थे। ज्यादातर तो कुल्हड़ की ही मांग होती थी।  चाक से उतारते ही उनके कुल्हड़ बिक जाते थे, वो रात को मिटटी के बर्तन  पकाने  के बाद  सुबह या दोपहर तक चाय की कितली पर पंहुचा  देते थे।  जिससे उनकी रोजी रोटी का आसरा मिल जाता था। धीरे धीरे  इनकी तलाश कम होती जा रही हैं। शायद कहीं इक्का - दुक्का जगह दिख जाए नही तो अब लोग प्लास्टिक ग्लास में चाय पीने लगे हैं। जिससे कुल्हड़ का चलन ख़त्म हो रहा हैं।   वह ग्लास जो बच्चो के खिलौने जैसे दिखते हैं।  और वह  प्लास्टिक ग्लास वाली चाय कहीं ५- तो कहीं १० रूपये की मिल  पाती  हैं जिसमें दो घूँट चाय जैसे उबलता पानी,न जायका न पत्ती वैसे देखा जाए तो  चाय दुनिया भर में अलग अलग तरीके से बना के पीते हैं कॉफी  मसाला चाय हरी चाय नींबू या आड़ू की  चाय, कुछ इस तरह  चाय लोगो का मन लुभा रही हैं,लेकिन सच तो यह है, कि कुल्हड़ वाली चाय से भारत कि पहचान को  दर्शाता हैं । 

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

तू भी एक इंसान बन

तू यूँ ही ना सवाल करना किसी कि ज़िन्दगी पे वार कर
तू एक इंसान बन तू एक इंसान बन
बना सके तो एक अच्छा जहाँ बना
जहाँ हो बस एकता जहाँ खूबसूरत ख्वाब् हो हर किसी के खवाब हो 
खिले भी फूल भी वहाँ जहाँ न हो रंग भेद भाव का न हो भेद जाति- पाति का 
जहाँ खिले फूल हर रंग के वोह बाग़ भी खुशी के संग झूमती रहे 
न बाँध उन ज़ालिमो की ज़ंजीरों से हमारे इन बुलंद सपनो को न कर किसी के सपनो कि हत्या न कुचले जाए किसी के घर न किसी माँ कि सुनी हो गोदन मंच पर ग़लत सवाल कर न लोगो को गुमराह करबहुत हुआ बहुत हुआ ?उठे हाथ इन्साफ के लिए चले क़लम इन्साफ के लिएएक खूबसूरत जहाँ हम बनाएंगेजहाँ हर किसी को इन्साफ मिलेजहाँ क़तार बे क़तार हो न मंदिर - मस्ज़िद का सवाल हो न चर्च का सवाल होमहफिलों में भी जहाँ सवालिया मिज़ाज़ हो !लफ्ज़ को सहेज कर किताब को हसीं कर 
न तू खुदगर्ज़ बन न तू हैवान बन
तू भी एक इंसान बन तू भी एक इंसान बन

हाँ मै एक कलम कार हूँ


हाँ मै एक कलम कार हूँ ...

देश के हर नागरिक की तरह में भी एक कलमकार हूँ , कभी मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी तो कभी कबीरदास के दोहों पर मंडराती थी, पहले बच्चे मेरे साथ साथ खेलते हैं । फिर युवा अपनी किस्मत आजमाते हैं ,कभी भगत सिंह तो कभी महात्मा गाँधी के इतिहासों को रचती थी । कभी खतों के पन्ने पलती हूँ किसी के मंजिल का रास्ता, तो किसी के घर का वास्ता, वोह कलम जहाँ हजारों - लाखो लोगो की रोजी - रोटी बनती हूँ ,देश के हर नागरिक का रास्ता मेरे पास से ही गुज़र कर जाता हैं, मै सबके हाथों में होती हूँ । मुझसे कोई सच लिखवाता हैं तो कोई झूठ, कभी शब्द को नाप तोल कर लिखा जाता हैं | कभी लोग मुझे बेच भी देते हैं | दौतल और शौहरत के लालच में, लेकिन मुझे जरूरत होती हैं एक सच्चे नागरिक कि, जो हर नागरिक के साथ हो रहे जुल्म का सवाल उठा सके |
हाँ मै एक कलमकार हूँ ...उन कोरे कागजों को भरने वाली किताबों को रंगने वाली ,
हाँ मै एक कलम कार हूँ । देश के हर नागरिक की तरह मै भी कलम कार हूँ ।