कुछ ख़्वाहिशों को कागज़ के हवाले करते हैं
कुछ दिल में नए रंग में ढलते हैं
कुछ ख़्वाहिशें ख़्वाबों का समां बांधती है
कुछ ख़्वाहिशें नया जनम लेती है
कुछ हमारे अपनों से मिल लेती है ये ख़्वाहिशें
कमबख़्त ये बताती कहाँ सारा दुनिया घूम लेती
हमारे यही रहते जाने कितने पन्नों को लिख डालती है
रात वाली काली चादर के तले सितारों से नज़रे मिलती
ख़्वाहिशें कभी कभी तो उसके पास से हो कर आ जाती है
लेकिन में देख सकता हूँ बस मेरे आसपास क़ुदरत की बनायीं जुगनुओ की रौशनी
कभी कभी मेरे तकिया के पास आती है मेरे अच्छे वाले ख़्वाब बनकर
तकिये के तले छुप जाती है आँख मचोली खेलती है
कभी दाएं कभी बाएं कभी ऊपर कभी नीचे फिर चली जाती है
फिर चली जाती है एक समां बना कर
अरमा नफीसा