गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

कुछ ख़्वाहिशों को कागज़ के हवाले करते हैं

कुछ ख़्वाहिशों को कागज़ के हवाले करते हैं 

कुछ दिल में नए रंग में ढलते हैं 

कुछ ख़्वाहिशें ख़्वाबों का समां बांधती है 

कुछ ख़्वाहिशें नया जनम लेती है 

कुछ हमारे अपनों से मिल लेती है ये  ख़्वाहिशें

कमबख़्त ये बताती कहाँ सारा दुनिया घूम लेती 

हमारे यही रहते जाने कितने पन्नों को लिख डालती है 

रात वाली काली चादर के तले सितारों से नज़रे मिलती 

ख़्वाहिशें कभी कभी तो उसके पास से हो कर आ जाती है  

लेकिन में देख सकता हूँ बस मेरे आसपास क़ुदरत की बनायीं जुगनुओ की रौशनी 

कभी कभी मेरे तकिया के पास आती है मेरे अच्छे वाले ख़्वाब  बनकर  

तकिये के तले छुप जाती है आँख मचोली खेलती है 

कभी दाएं कभी बाएं कभी ऊपर कभी नीचे फिर चली जाती है 

फिर चली जाती है एक समां बना कर 

 



अरमा नफीसा 

रविवार, 3 अक्टूबर 2021

अमीर ख़ुसरो


 

मैं उठी तुझे देखन चली फूलों के बहार में

कि ख़ुसरो के चाहने वाले आये है

इसी गुलाबी मौसम के बहार में

जब में खुसरो के आँगन जा बैठी चिराग़ जलाने

अब चिराग़ क्या जलाये जब हवाएं तेज़ हुई

अगरबत्तियां भी क़तार में

मुश्किल से चिराग़ जला भी

तो मन्नत की अगरबत्तियां

तो कुछ ही देर में जल कर सब ख़ाक हो गई

जब खाक़ गिरी चिराग़ से नीचे तो ख़ाक हो गई मिटटी

देख ख़ुसरो पिया भर गया तेरा आंगन चाहने वालों से

फिर उन्हें हवाओं की क्या फ़िक्र

देखो मौसम आया रंगों के बहा­­­­ से

मैं भी बैठ गई आँगन में ख़ुसरो के

जो आँगन रंगों के त्यौहार में था

अरमा नफीसा 

शनिवार, 18 सितंबर 2021

उलझने हमेशा उलझनों को जन्म देती 

कमबख़्त ये समझती कहां  है 

 चुनांचा इनसे इनका ज़िक्र करना  लाज़मी  है 

अपने लफ़्ज़ों में सफ़ेद कागज़ पर 




अरमा 


सपने तो बहुत सजा लिए मैंने 

इतनी लम्बी तो ज़िन्दगी भी नहीं है 


अरमा नफ़ीसा अंसारी 



शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

मशरीख़ मग़रिब सुमाल जुनूब

 मशरीख़ मग़रिब  सुमाल  जुनूब 

लम्हा इन्ही चारों दिशाओं के इर्द गिर्द है 

लम्हा ज़िद्दी है बढ़ रहा है रुकने का नाम नहीं 

कल आया कौन आया कौन मिला कौन बिछड़ा पता नहीं 

कौन सा दिन आया कौन सा दिन गया सिर्फ उँगलियों पर गिनते है 

वक़्त समुन्दर की लहरों की तरह उमड़ रहा है 

नदियों झीलों के किनारे शाम की सुर्खिया फ़ीकी पड़ रही थी

काली रातें जुगनुओं की रौशनी से खूबसूरत लग रही है 

हवाएं बखूबी से अपना परचम लहरा रही है 

~अरमा अंसारी 

बुधवार, 5 मई 2021

मेरे घर में परिंदे भी है जानवर भी

मेरे घर में परिंदे भी है जानवर भी 

घर के बड़े बूढ़े जानवर पालने  का बड़ा शौक रखतें हैं 

घर में पेड़ों की बहार है बहारों पर फूलों का गुच्छा 

गुच्छों पर तितलियों का मंडराना 

और मैं  उन दोनों को निहार रहा था दूर के बरामदे में  बैठे 

वह जो घर का बूढ़ा आदमी सुबह अपनी छड़ी ले कर पेड़ों के पास रोज़ाना बैठता था 

काफी अच्छा रिश्ता था दोनों के बीच यानी पेड़ और बूढ़ा इंसान रोज़ाना पेड़ों को पानी भी वही देते 

घर में और भी पालतू जानवर थे वह तो घर भर में चक्कर लगते 

जो जयदा प्यार करता उसी के पास जा कर बैठ जाते 

लेकिन उन्हें प्यारे जानवरों को पता था घर का मालिक उनका सबसे अच्छा दोस्त है 

मेरा घर का कुत्ता बड़ा वफ़ादार, जाने कितने कुत्ते आये बड़े नाम रखे 

किसी का मोती शेर किसी का टाइगर, घर का आधा परिवार था 

बड़े नखरे थे, बैठने का अंदाज़ ही अलग था उसका 

अक्सर खिड़की  के पास बैठ कर आते जाते सबको देखता 

घर में कोई भी नया इंसान आता तुरंत पता चल जाता कोई बेल की ज़रुरत नहीं 

कभी कभी लगता है इनका रहना हमारे आपपास अच्छा लगता है 

इन जानवरों की ज़रुरत हमें भी है,  जानवरों को भी है 

ये हैं तो सदियों का साथ है हमारे दिल का हिस्सा हमारे दिल का पहरा 

लाखों मेहरबां हुए जाने कितने दिल इन जानवरों पर , वरना जाने कितनों के घर वीरान है इन जानवरों के बिना 

और संसार वीरान है हवा पानी और परिदों के बिना हम सब की ज़िन्दगी कलरफुल है इन्ही लोगो के साथ 

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

 रमजान का महीना है ऐसे वक़्त में लखनऊ और बाराबंकी की याद आती है कितना भी मन बहलाने के लिए बाटला  हाउस और पुरानी  दिल्ली घूम लो वोह बात नहीं है जो लखनऊ के शहर अमीनाबाद में है  लेकिन लखनऊ भी काफी बदल चूका है वह १५ साल पहले वाले उर्दू लफ्ज़ सुनाई नहीं देते मेरे नाना बताते हैं जब वह तिब्बिया कॉलेज में पढ़ते थे चौक अक्सर टुंडे कबाब खाने जाया करते थे  उस दौर के लफ्ज़ आज भी कानो में गूंजते हैं जब उसे बोलते थे लखनवीं ज़ुबां 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

 खुदा न ख़ास्ता  मौसम रूठ गया तो ये फ़िज़ाएं मुसाफ़िर  बन जाएंगी फिर खुदा से शिक़ायत ना करियेगा ज़िन्दगी ताकिया-ऐ -कलाम है, ये वह लफ्ज़ के टुकड़े है जहाँ पैग़ाम है मुहब्बत लोगो की ज़िन्दगी की ज़रुरत है कई वरक़ों  का फलसफ़ा रंगीन इंक से लबरेज़ है


अरमा नफीसा 

रविवार, 4 अप्रैल 2021

बचपन और ज़माना

चलो फिर से हँसते हँसते लोट-पोट  हो जाए 
फिर बचपन की तरह आँखों में खुशियों के आँसू  छलक जाए 
फिरोज़ी आसमान के नीचे बैठे, हरी मख़मली चादर पर 
बचकानी हरक़तें कर हरी घास की पंखुरी चबाएं
पिंक स्वेटर को उतारते हुए नीचे सर रखने के लिए तकिया बनाते हुए औंधे मुंह लेट जाए 
करू दूँ हवाले गुनगुनी धुप के, अपने तन के कुछ हिस्से 
और फिर सूरज पर मूँदती आँखें गड़ोए सूरज से टकराये मेरी आंखें 
ना कल की फिक्र हो न ज़माने की परवाह 
बड़बोले लफ़्ज़ों में हो न हो कोई वजह 
फुर्शत मिले जाए तो क़लम को दांतों के तले दबाते हुए उन लफ़्ज़ों को ढूंढ  लाऊँ 
जो मेरी डायरी में एक दम सटीक बैठ जाए 
और स्याही भी उतनी ही रफ़्तार में बुन लेती है कई वजह 
कहानियां ज़िद्दी हो तो काग़ज़ पर अपनी जगह बना लेती है 
फिर ज़माना कोई भी हो 

अरमा अंसारी